Monday, 5 September 2016

ख़ुदा-हाफ़िज़

बड़े ख़ामोश रहते हो.. ऐसे कैसे कटेगा सफ़र?
-नहीं तो।
अच्छा! फ़िर मुझे ये बताओ कि तुम्हारी कोई गर्ल-फ्रेंड है?
-नहीं।
अरे! इस उम्र में तो सबकी गर्ल-फ्रेंड होती है, तुम्हारी कैसे नहीं है? अब है.. तो बता भी दो फिर मुझसे क्या शर्माना।
-होती तो जरूर बताता तुम्हें।
चलो, नहीं है तो फिर बना लो?
-नहीं रहने दो। ये कोई चीज़ नहीं.. जो नहीं हैं और जब जरूरत हुई तो बना ली। कुछ चीजें एहसास में ही रहे तो अच्छा है। मुहब्बत कोई पा लेने का नाम नहीं, मुहब्बत में होकर उससे गुजरते रहो बस यहीं काफ़ी है।
बातें तो बहुत कमाल की किया करते हो, कोई भी सुने तो दीवाना बन बैठे।
-हुम्म्म्म। बस यहीं रोक दो, यहाँ से बहुत क़रीब  है मेरा मक़ान।
यहाँ?
-हाँ, यहीं किनारे।
लेकिन यहाँ ना तो कोई बस्ती है और ना ही कोई शहर नज़र आता है?
-हाँ, लेकिन इस रेगिस्तान के ठीक पीछे से एक नदी गुजरती है और उसके बाद मिलता है हमें अपने गाँव जाने का रास्ता। अग़र शहर के चक्कर लगाकर जाएं तो पूरी दिन लग जायेगी और फिर वहाँ से उस पार जाने के लिए कोई नाव भी नहीं मिलेगी, तुम यहीं रोक दो।
लेकिन तुम चाहो तो आज मेरे साथ मेरे घर पर रूक सकते हो।
-नहीं आज नहीं.. लेकिन फिर कभी जरूर।
बाय!
-ख़ुदा हाफ़िज।
ओके।
गाड़ी से उतरने के बाद वली सीधा रेगिस्तान के बीचोंबीच से होकर उसे पार करने लगा और उसे इस तरह रेगिस्तान में निर्भीक चलता हुआ देखकर.. माहम ने तबतक अपनी गाड़ी आगे नहीं बढ़ाईं जब तक वो उसकी आँखों से ओझल ना हो गया।
शाम अब कुछ ही देर में ढ़लने वाली थी.. माहम को अचानक कुछ ख़याल हुआ और उसने गाड़ी आगे बढ़ा दी।
थोड़ी देर बाद.. अज़ान की आवाज़ ने लगभग पूरे रेगिस्तान को घेर लिया। वली अब नदी किनारे आ चुका था। कुछ लोग दौड़ते हुए वली की तरफ़ आएँ.. उनके हाथों में बंदूक थी। वली उनकी तरफ़ बढ़ता चला गया और जाकर पूछा - हाँ, बताओ क्या बात है?
कुछ नहीं वली साहब!
इतनी शाम हो चुकी थी और आप अभी तक नहीं आये थे, इसलिए हम सब घबरा गए थे। अभी हम आपको ढूंढने के लिए निकलने ही वाले थे..
-ख़बरदार! जो तुमलोगों ने अपने दिमाग़ का थोड़ा भी इस्तेमाल किया। तुम लोगों को पता नहीं.. माहम हमारे लिए कितनी जरूरी है और वो जब तुम लोगों ऐसे लिबास में मेरे साथ देखेगी तो फ़िर सब किये-धरे पर पानी फिर जायेगा। अब मुँह लटकाकर क्या सोच रहे हों जाओ मेरे वुजू का इंतज़ाम करो।
जी छोटे मालिक अभी करते हैं।
-और दानियाल साहब आप रूकिये। कोई ख़बर मिलीं?
नहीं। मग़र हमने सब लड़को को काम पर लगा दिया है, ज़ल्द ही ख़बर मिल जायेगी। मैं ये सोच रहा था.. अग़र आप बुरा ना माने तो..
-हाँ-हाँ, बताइये। आप हमारे ख़ानदानी सलाहकार है.. आपको इतना हिचकना नहीं चाहिए और हम बस आपको अपने परिवार का हिस्सा कहते नहीं बल्कि मानते भी है।
जी, मैं वो सोच रहा था कि.. अगर आप कहें तो क्या हम कमीशनर से इसके बारे में बात करे?
-नहीं-नहीं दानियाल साहब! फिलहाल इसे ख़ुद से देखिये। मामला आगे बढ़ा तो बहुत नुकसान हो सकता है हमारा।
जी, बहुत बढ़िया जैसा आपका हुक़्म।
छोटे मालिक नमाज़ करने का सब इंतज़ाम हो चुका है।
-हुम्म्म्म। ठीक है! तुम चलो.. मैं आता हूँ।
दानियाल साहब! आप कल बड़े दरबार होकर आइये.. देखिये मेरी फ़िक्र मत कीजिए मैं यहाँ पर ठीक हूँ। आप जाकर वहाँ से एक-बार पता लगाइये। शायद कुछ हाथ लग जाए। अब इज़ाजत दीजिए।
जी! मैं कलके जाने का इंतज़ाम करता हूँ। और 2/3 दिन में लौटकर आने की भी पूरी कोशिश करूँगा।
अगली सुबह.. रेगिस्तान के सामने
सड़क किनारे..
वली नाम बताया था ना तुमने?
-हाँ।
तो तुम कल ख़ैरियत से पहुँच गये थे अपने गाँव?
-हाँ। तुम्हारा बहुत शुक्रिया। वर्ना इस अंज़ाने से शहर में कौन हम गांव के लोगों की मदद करता है?
वो तो है। मैं कुछ ज्यादा ही नेक़दिल इंसान हूँ।
तो आज फिर नौकरी ढूंढने आये हो?
-हाँ! उसी कोशिश में हूँ।
हुम्म्म्म। अपने डाक्यूमेंट्स दिखाओ, शायद मैं कुछ मदद कर सकूँ।
-वो तो.. मैं नहीं लाया।
लो जी! ज़नाब नौकरी ढूंढने निकले है और साथ में कोई डाक्यूमेंट्स भी नहीं।
अच्छा! ये बताओ पढ़ाई कहाँ तक की है तुमने?
-ज्यादा नहीं। मास्टर्स किया है एकाउंटेंसी में।
हुम्म्म्म। मिल जायेगी तुम्हें फिर कल नौकरी। अपने डाक्यूमेन्ट्स साथ लेते आना।
-ठीक है।
अरे! बस ठीक है। मैंने कल तुम्हारे नौकरी लगने की बात की है और तुम बस ठीक है कहकर बच निकलना चाहते हो। मेरे साथ चुपचाप गाड़ी में बैठो। तुम्हें तो पार्टी देनी पड़ेगी।
अब इतना घबराओ मत.. आ जाओ.. मुझे पता है तुम्हारे पास पैसे नहीं है। इसलिए आज जो भी ख़र्च होगा वो मैं दे दूंगी जब तुम्हें अपनी पग़ार मिल जाये तो मुझे वापस कर देना। अब चलो जल्दी।
और बताओ क्या करते हो तुम ये नौकरी ढूंढने के अलावा?
-कुछ नहीं। थोड़ा -बहुत म्यूज़िक का शौक है और कभी-कभार सर्दियों की रात में अपनी डायरी में कुछ लिख लेता हूँ।
ओहो! तो ज़नाब शायर है। फिर सुनाओ कुछ?
-हुम्म..
इन इबादतों में तेरा जिक्र क्या
ये अब्र क्या है ये हवा क्या
मुहब्बत की गुस्ताख़ किताब
ये हर्फ़ क्या है ये मिज़ाज क्या
कोई जलती चिंगारी थी मुझमें
बारिश के बाद हुआ हश्र क्या
दामन जिसका छूटता ही नहीं
वो ना मिला तो फिर गिला क्या
सहमीं सी निगाहों का कुसूर है
वर्ना ये दर्द क्या है ये दवा क्या
इन इबादतों में तेरा जिक्र क्या
ये अब्र क्या है ये हवा क्या।

वाव्व! टू गुड़। इट्स योर?
-पुरानी सी है।
अच्छी है लेकिन। चलो आ गया, अब उतरो।
-ये कहाँ ले आई हो तुम?
मुझे पता है। अब कुछ और ना पूछो मुझसे और चुपचाप चलो। अभी तो पूरी दिन गुजारनी है.. और तुम्हारा ये सवाल-जवाब अभी से ही शुरु हो गया।
शाम का वक़्त.. ढ़लता हुआ सूरज..
रेगिस्तान के किनारे रूकी हुई माहम की गाड़ी।
आज चाहो तो तुम चल सकते हो मेरे साथ मेरे घर।
-और डॅाक्यूमेंट्स?
हाँ-हाँ! मैं तो भूल ही गई थी.. इन सब चक्करों के बीच।
वली एक बात बताऊँ? तुम्हें देर तो नहीं हो रही है ना?
-नहीं..नहीं.. बताओ।
वली! मेरे दादा अबुल हामिद है। शायद ऐसा हो सकता है कि तुमने इनका नाम अख़बारों या न्यूज़ चैनलों में सुना हो। वे एक बड़े से रियासत के मालिक है और मैं उनकी इकलौती पोती हूँ। अब्बू के इंतक़ाल के बाद मेरे दादा ही मेरे लिए सबकुछ रहे हैं और नाजाने अब ऐसा क्यूं लग रहा है कि मैं तुम्हें चाहने लगी हूँ। देखो ये तुम्हारे लिए अज़ीब हो सकता है.. कि एक दिन पहले मिले शख़्स से बिना जाने-पहचाने कोई कैसे मुहब्बत कर सकता है। मग़र मेरी मानो तो यही सच है। मैं ज्यादा इंतज़ार भी नहीं कर सकती थी.. कि इस मुहब्बत को कुछ दिनों तक समझूं और जब एहसास हक़ीकत में बदले तो फिर बयां करूँ। कुछ दिनों बाद मेरी मँगनी होने वाली है और शायद मैं इन सबसे दूर निकलने के लिए तुम्हारे मुहब्बत में क़ैद हो गई हूँ। मुझे वो कल शाम तुम्हारा.. यूं इस रेगिस्तानी टीले को पार करके अपने गाँव जाना.. ऐसा लग रहा था कि जैसे कोई मेरी ही सफ़र कर रहा हो और मैं धीरे-धीरे इस जुल्म के दुनिया से कहीं दूर चली जा रही हूँ.. दूर.. बहुत दूर।
-माहम! मैं ये सब जानता हूँ.. और मुझे ये भी पता है कि जिससे तुम्हारी मँगनी तय हुई है वो तुम्हारे ख़ाले का लड़का है। उससे तुम्हें सख़्त नफ़रत है। उसने अपने चेहरे पर एक मुखौटा लगाकर तुम्हारे दादा को इसके लिए राज़ी करवाया है।
इतने हैरान होने की कोई जरूरत नहीं है। मैं भी तुमसे प्यार करता हूँ और मैं तुमसे कुछ छिपाऊँगा भी नहीं। माहम! मैं वली हूँ.. वही वली जिससे तक़रीबन 17 साल पहले तुम्हारी मँगनी हुई थी। तब तुम्हारे दादा ने मेरे दादा के साथ मिलकर बड़े हवेली के पीछे हमारी मँगनी करवाईं थी।
तुम झूठ बोल रहे हो! तुम वो वली नहीं हो सकते। ख़ुदा की कसम.. एक बार बोल दो तुम वो वली नहीं हो.. बस एक बार बोल दो।
-माहम! मैं बस तुम्हारे ख़ातिर यहाँ आया हूँ। मेरे दादा तुम्हें बस एक बार अपनी आँखों से देखना चाहते है। प्लीज मेरे साथ एक बार चलो।
चले जाओ मेरी नज़रो से दूर.. तुम क़ातिल हो। तुम लोगों ने मेरे अब्बू को मार डाला.. मेरी अम्मी 12 सालों से सदमे में जीये रही हैं और तुम्हें अभी भी अपने दादा की फ़िक्र सताये जा रही है। चले जाओ!
वली जाने लगता है।
माहम फिर दौड़कर उसके कॅालर को पकड़कर कहती है- तुम लौट के ही क्यूं आयें, मेरी ज़िन्दगी में। और उसके सीने पर बेतहाशा होकर हाथों से मारने लगती है। फ़िर धीरे-धीरे वो ढ़ीली होकर उसके पैरों के पास आ जाती है।
वली उसको उठाने के लिए जैसे ही नीचे झुकता है.. एक गोली उसके सर के ऊपर से गुजर जाती है.. फ़िर एक के बाद एक.. सैकड़ों गोलियाँ। चारों तरफ़ से गोलियों और गाड़ियों की आवाज़ पूरे रेगिस्तान में गूंजने लगती हैं। माहम सहम कर फिर से वली की बाहों में छिप जाती है। वली माहम को बाहों में थामें एक गाड़ी की तरफ़ दौड़ता है। वली के गाड़ी तक पहुंचने पर उसे अपने शरीर में शून्यता का आभास होता है। माहम उसकी बाहों से छूट जाती है। रेगिस्तान ख़ून की रंग में डूब गया होता है। धीरे-धीरे गोलियों की आवाज़ भी ख़त्म होती जाती हैं। कुछ लोग कराह रहे होते हैं.. फिर एक ख़ामोशी घिर जाती है पूरे रेगिस्तान में। दिन धुंधला के ग़हरी शाम की चादर ओढ़ लेती है।
वली को ज़मीन से औंधा लिपटा हुआ देखकर माहम तेज़ी से दौड़कर उसके पास जाती है.. और वली का सर अपने गोद में रख लेती है। वली के चारों तरफ़ खड़े उसके आदमी उसे उठाकर उसे अस्पताल ले जाने की बातें करने लगते है। हेलिकॉप्टर मंगाया जाता है.. मग़र वली सबको मना कर देता है और माहम के हाथों को कसकर भींच लेता है। सब वली को देखकर आँसू बहाने लगते हैं। माहम वली को इस हालत में देखकर अंदर ही अंदर बिलखने लगती है। वली उसकी तरफ़ नज़रे उठाकर एक कंपकपाती सी आवाज़ में कहता है- माहम! तुम्हें, तुम्हारे सारे सवालों के ज़वाब बड़े दरबार में मिल जायेंगे। तुम मुझसे लाख़ शिक़ायत रखो मग़र मैंने तुमसे हमेशा से मुहब्बत की है। मुझमें अब इतनी जान नहीं कि मैं सब बयां कर सकूँ। मैं तुम्हें अपनी एक अमानत देता हूँ। तुम इसे प्लीज मेरे घर के दहलीज़ तक बस लेकर चले जाना.. फ़िर जो तुम्हें ठीक लगें तुम वही करना।
वली दानियाल की तरफ़ देखता है। दानियाल एक सूटकेश माहम की तरफ़ बढ़ा देता है। वली अपनी आँखों की इज़ाजत से उसे लेने को कहता है, माहम बिना कुछ बोलें उसे चुपचाप थाम लेती है। वली एक सुकून की साँस भरता है और कहता है- ख़ुदा हाफ़िज़, माहम!
माहम रेगिस्तान के मौन में अनंत तक चीख़ उठती है.. वली...।
अगली सुबह माहम बड़े दरबार के दहलीज़ पर सालों बाद अपना पहला कदम रखती है। लोगों के लाख़ों बहिष्कार के बाद भी वली के दादा उसे सीने से लगा लेते है। वो उन्हें सूटकेश देकर जाने लगती है तभी उसे सालों पहले की कोई बात याद आती है। जब वो एक बार ऐसे ही यहाँ से जा रही थी तो वली ने पीछे से दौड़कर आकर कहा था- ख़ुदा हाफ़िज़।
अपनी आँखों में आँसू संभाले वो अचानक से पीछे मुड़कर चिल्लाई- ख़ुदा हाफ़िज़, वली!
फ़िर.. कुछ दिनों बाद से कहा जाता है कि माहम बड़े दरबार में ही रहने लगी थी। वो वली के कमरे में रहती और उससे हर वक़्त बातें किया करती। वो सबको चीख़-चीख़कर बताती की वो वली से अभी भी बातें किया करती है। वली भी चुपचाप नहीं सुनता है उसे.. वो भी झगड़ता रहता है उससे।
फ़िर और कुछ दिनों बाद.. बात-बात पर वो वली के दादा के पास जाकर उसकी शिकायत किया करती। कुछ लोगों का कहना था कि वो पाग़ल हो गई थी और वो सबसे बेहिचक कहा करती कि.. वो ये सब मुहब्बत में करती है या उससे ऐसा हो जाता है। अग़र ये पाग़लपन है तो ये पाग़लपन उसे हर शर्त पे मंज़ूर था। वो आज भी हर आने-जाने से ख़ुदा-हाफ़िज़ कहा करती है। इसी बहाने वो वली को और ख़ुद को इस दुनिया में कहीं ना कहीं ज़िंदा किये रखें हुए है।
बाक़ी कहानी कभी और.. किसी दिन.. फ़ुर्सत में। तबतक के लिए.. ख़ुदा-हाफ़िज़।

नितेश वर्मा

पियरका गुलाब

बेटा बताएं रहें हैं.. अभियो से भाग लो, वरना पियरका गुलाब देने के चक्कर में ढ़ंग से कूचा जाओगे। बेटा इ दिल्ली ना है कि इहाँ गुलाब के कलर से मतलब निकाला जायेगा.. इहाँ गुलाब का बस एक्के मतलब होता है और उ है प्यार, मुहब्बत, इश्क़-ए-इज़हार। लगता है.. तुम इ वाले शे'र से अभी बहुते दूर हो.. अबे सुन लो बे! काहे ऐतना जल्दी में भागे जा रहें हो। शे'र पेश करते हैं.. मुलाहिज़ा फ़रमाइयेगा।
- इरशाद.. इरशाद..! जल्दी बको और दुबारा आगे रस्ता मत रोकना।
यार! कसम से बहुते मूड बनाके आये है.. कुछ भी हो जाएं आज गुलाब तो देकर ही मानेंगे।
- हाँ-हाँ तो हम कब मना किये है मत दो। देखो तुम्हारे साथ भी तो आये है.. तुम्हारे लिए बैक-अप बनके।
हाँ तो अब शे'र सुनो-
उनसे इश्क़ है तो तुम उनके कूचे जाओ
हमहूँ ख़ूब कूचे गए है, तुमहूँ कूचे जाओ।

हीहीहीही.. हीहीहीही.. हीहीहीही।
भाग साले, हरामी। ढ़ंग से भी कभी कुछ बोल लिया कर।
-अच्छा ये बता वो तुमको देखकर मना कर दे तो? तब क्या करोगे। अबे अब इतना ज्यादा जोर से मत दबाओ.. फूलवा को.. हमारी पहचान है दुकानदार से कुछ लेस करके पूरा पैसा वापस करवा देंगे। मग़र ऐसे मुफ़्त में नहीं.. शाम के समोसे तुम खिलाओगे और कोल्ड-ड्रिंक भी।
भाई! ये मेरी गलती है.. मैंने तुझे बताया ही क्यूं था और तो और साथ भी लेकर आया हूँ.. भुगतना तो अब पड़ेगा ही।
-छींछीं! ऐसी बातें नहीं करते भाई। और अपने कलाइ पर तो देख.. मैंने जो फ्रेंड़शिप बैंड बांधा है.. धूप की रोशनी में आकर कैसे निखर गया है। कितना प्यारा लग रहा है?
-भाई! अब एकदम चुप। देख उसका गली आ गया है। अब तू कुछ नहीं बोलेगा और तू यही रुक मैं उसे गुलाब देकर आता हूँ। और सुन किसी को गली में आने मत देना.. जबतक मैं आ नहीं जाऊँ, कुछ समझा?
-क्या? कुछ बोला क्या तुमने?
अच्छा काम हो गया तो शाम को पिक्चर पक्का।
-अरे.. जा तू भाई! एक परिंदा भी इधर से उधर पर नहीं मारेगा।
10 मिनट बाद..
अबे भाग! भाग.. जल्दी भाग।
-अबे क्या हुआ.. बोस डीके?
भाग.. भाग।
पीछे से ईंटें हवा में आती दिखाई दीं.. तो दोनों की रफ़्तार तेज हो गई। थोड़ी देर बाद जब शोर कम हुई तो दोनों रुककर हाँफ़ने लगे।
अबे का हुआ थे बे उहाँ?
-का बताएँ, हम गुलाब बढ़ा के दिए तो वो शर्मां के बार-बार आँखें नीचे कर ले। अब हम इसी उल-जुलूल में उलझे थे कि उसका बाप ऊपर से हमको ताड़ रहा था। एकबेएक जब हमारा नज़र मिला.. हम तो पहले हड़बड़ा गए फिर आराम से मुस्कुराएँ और इनको देखा तो वो अभी भी शर्मां ही रही थी।
ग़ुस्से में आकर दिया कंटाप पर एक जोर से और जबरदस्ती गुलाब पकड़ा दिया.. देखा तो वो ज़मीन पर दूर जाकर बैठ गई है।
फिर उसके बाद उसके बाप ने ऐसा हो-हल्का मचाया कि मुहल्ले के सारे लोग पत्थर लेकर पीछे पड़ गए। दे पत्थर.. दे पत्थर.. मारा भाई बहुत चोटें आई हैं। मगर बस इस बात की भी खुशी है कि किसी ने पहचाना नहीं.. ये तेरा मुँह पर तौलिया बाँधने वाला आइडिया क़माल का निकला।
-साले! हम पहिले ही मना किये थे कि उसके घर के लोग आम आदमी नहीं है। सब साले रावण के ख़ानदान के हैं, तुझपर तो जाने क्यूं रहम दिखाई वरना उन्होंने तो बस चाकू-छुरे चलाकर मारे थे इससे पहले। हीहीहीही.. हीहीहीही.. हीहीहीही।
हें सच में? आह!
- और नहीं तो क्या? और बेटा एक और ज्ञान की बात धर ले.. मुझे ख़त लिखता देखकर पूछ रहा था ना कि अबे गंवार ई का कर रहा है बे?
तो बेटा सुन.. मैं आज भी ख़त इसलिए लिखता हूँ क्योंकि उसके पास चाहते हुए भी मैं कोई गुलाब नहीं पहुंचा सकता।
- भाई तू टेंशन मत ले। शाम की पिक्चर पक्की है.. तेरी दोस्ती के नाम एकदम मुफ़्त.. पर समोसे तू खिलायेगा।
- हीहीहीही.. हीहीहीही.. मंज़ूर।

नितेश वर्मा
#HappyFriendshipDay  

दास्तान-ए-दर्द: मीना कुमारी

मीना कुमारी.. एक अदाकारा.. एक लेखिका.. एक क़िस्सों की ज़ुबानी। ट्रेजडी क्वीन के नाम से मशहूर इस अदाकारा को ऊपरवाले ने एक साथ ही ग़म और खुशियों से ऐसे नवाज़ा था कि सब देखकर बस हैरान हो जाते थे।
मीना कुमारी का असली नाम मज़हबी था, घर पर लोग उन्हें मुन्ना बुलाते थे। बचपन बहुत ग़ुरबत में गुजरीं, उन्हें 4 साल के उम्र से ही फ़िल्मों में बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट अभिनय करना पड़ा। घर में फ़ाँके-फ़ाँके की कमी रहती, पैसे की जुगत में माँ भी 2/3 दिनों के लिये रोटियां थोपकर कमाने चली जाती और वही मीना कुमारी को हरी मिर्च,नमक और प्याज़ से खानी पड़ती, इसलिए मीना कुमारी को तमाम उम्र बासी रोटी अच्छी लगी। घर में प्रेम-ख़िचाव नहीं रहा तो वो फिल्मी क़ैमरे की तरफ़ आकर्षित हो गईं।
मीना कुमारी जवान हो रहीं थीं, लेकिन वो अपने घर के लिए मशीन की तरह दिन-भर काम करती और बदले में उन्हें बासी रोटियां मिला करती और वो हर शाम अशर्फ़ियाँ उगला करती, इस तरह उनका बचपन मर गया। उनकी दो बहने थी ख़ुर्शिद और मधु.. ख़ुर्शिद शादी के बाद पाकिस्तान बस गई और इधर मीना के माँ-पिता में बनी नहीं वो दिन भर काम करके घर लौटती और इधर इनका झगड़ा शुरू हो जाता। मीना का दिल ये सब देखकर पत्थर हो गया। उन्हें तरह-तरह के पत्थरों को सहेजने का शौक हो गया, रात में पत्थरों को अपने साथ सुलाती और उनसे ही बातें करती। जब उन्हें लगा कि ये पत्थर उनके दर्द से नहीं पिघलते तो उन्होंने अपनी ज़ज्बातों को काग़ज पर उकेरना शुरू कर दिया। छोटी-छोटी नज़्में, शायरी और कहानियाँ लिखने लगी, इसी बीच माँ गंभीर रूप से बीमार पडी और इस दुनिया से वो चल बसीं।
फ़िल्म अलाउदीन का चिराग़ करने पर उन्हें दस हज़ार रुपये मिले और उन्होंने उससे अपनी पहली कार खरीदी और उससे पूरे मुंबई का सैर कर डाला।
मीना कुमारी जवान हो चुकी थी और इस उम्र में आकर वो कमाल अमरोही को दिल ही दिल से अपना मान बैठी थी। वो रात-रात भर बैठकर सोचा करती कि काश! कमाल से उनकी कभी मुलाक़ात हो जाएं और एक दिन कमाल ख़ुद उनके दरवाज़े पर पहुँच गए। वो उस वक्त अनारकली बना रहे थे और उन्हें एक अदाकारा की जरूरत थी और वो अदाकारा थी मीना कुमारी। वैसे तो कमाल मीना से उम्र में 15 साल बड़े थे मग़र मीना को इस बात की कोई फ़िक़्र नहीं थी। 14 अगस्त 1953 को उन्होंने अपने पिता के ख़िलाफ जाकर कमाल अमरोही से शादी कर ली और अगले ही दिन अपने पिता को एक ख़त लिखा-
बाबूजी
मैं आपका घर छोड़ आई हूँ। मेरे कपड़े और किताबें वहाँ हैं। जब सहूलियत हो तो भिजवा दे। मैं अपनी कार आपको कल तक भेज दूंगी। आपको आने-जाने में दिक्कत नहीं होगी। आपसे हाथ जोड़कर एक ही विनती है कृपया कमाल को दामाद मान लीजिए और तलाक़ की बात मन से निकाल दीजिए। कमाल आपको सलाम कहते है।
आपकी प्यारी बेटी
शादी के बाद मीना कुमारी की ज़िन्दगी जैसे बदल गई.. दिन में वो और कमाल काम करते, शाम में घर आकर घर साफ़ करते, रम्मी खेलते और रात में मूवी देखने जाते। मीना ने कमाल की पहली पत्नी और बच्चों को भी अपना बना लिया था।
एक बार फिर उनका घर उजड़ गया था। मीना डायरी लिखने लगी थी वो कभी ख़ुदको इसका ज़िम्मेवार ठहराती तो कभी कमाल को, फिर सबसे हारकर रब से इस नियति का शिकायत भी करती। मीना की डायरी से फिर एक मीना निकली जो पहली मीना से बिलकुल अलग थी, वो नाज़ के नाम से लिखा करती थी।
अगस्त 1964 से वो जुहू के एक बंगले में रहने लगी थी जहाँ उनके पास थी तन्हाई, शराब, शायरी और घना अँधेरा। वो उस वक्त अंदर तक टूट चुकी थी.. दिन-भर कमरे में ख़ुदको बंद करके रखती और शराब में डूबी रहती।
मीना कुमारी ने अपनी सारी डायरी गुलज़ार साहब को सौंप दी थी जिसे बहुत मेहनत के बाद गुलज़ार साहब ने उसे एक क़िताब का रूप दिया है - मीना कुमारी की शायरी। इसके लिए आपका बहुत शुक्रिया गुलज़ार साहब।
एक बार मीना कुमारी के ज्यादा शराब पीने से उनके मुँह से ख़ून की उलटियाँ होने लगी और वो बीमार पड़ गई.. डाक्टर ने इलाज किया फिर हिदायत दी- अब जब कभी मरना हो तो शराब पी लेना। मीना ने शराब छोड़ दी और एक नया शौक पान खाने का पकड़ लिया। शराब बंद हो चुकी थी वे दिन भर क़िताबे पढ़ती और डायरी लिखा करती। नया शौक नयी हवा.. वो दिन भर में 40-50 पान खा जाया करती और हर पान के बाद एक ठंडी ग्लास बर्फ से भरी पी जाती
पाक़ीज़ा को बनाने में फिर मीना और कमाल एक हुए। एक बार फिर से मीना की ज़िन्दगी में वही हँसीं.. वही उम्मीद की लहर दौड़ आई थी जिसे मीना अपने से कभी जुदा नहीं होने देना चाहती थी। पाक़ीज़ा के इस डायल्ग़ को क्या कभी भूलाया जा सकता है -
माफ़ कीजिएगा, इत्तेफ़ाकन आपके कमपार्टमेंट में चला आया था.. आपके पांव देखें.. बहुत हसीन है.. इन्हें ज़मीन पर मत उतारियेगा मैले हो जायेंगे।
मीना कुमारी ने अपने एक ख़त में यहाँ तक लिखा था कि मैं उन्हें कभी माफ़ नहीं करूँगी जिन्होंने मेरी और कमाल की शादी तुड़वाई।
25 मार्च 1971 को वो एकबएक बीमार हो गई
लोगों ने डाक्टर के पास जाने को कहा मीना होश में आ चुकी थी उन्होंने मना कर दिया और बोली.. की वो कल जायेंगी डाक्टर के पास। अगली सुबह उन्होंने अपनी बहन ख़ुर्शिद को बुलाया और पूछा कि - हमारे पास कितने रूपये है?
उनकी बहन ने कहा - 100₹
100₹ में क्या ख़ाक इलाज होगा मेरा और यह कहकर वो एकदम चुप हो गई।
और सोचने लगी ये क्या विडंबना है जो कभी लाखों रुपये दान कर देती थी आज उन्हीं के पास अपने इलाज के भी पैसे नहीं है। मीना कुमारी इस अवस्था में आकर यादों में खो चली थी.. एक के बाद एक उन्हें नजाने कितनी कही-अनकही.. गुजरीं-आपबीती याद आने लगी। कुछ क़िस्सों में मीना बताती है -
एक रात फ़िरदौस मेरे दरवाज़े पर आई और बोलने लगी तीन दिनों से कुछ नहीं खाया है कुछ खाने को मिल जाता तो.. मैंने उसे बिठाया खाना खिलाया।
अगले दिन वो ज़िद करने लगी कि मुझे कोई काम पर रख लो। मैं भी हारकर उसे अपने स्टूडियो में नौकरी पर रख लिया और नौकरी भी क्या थी स्टूडियो में वो मेरे पास खड़ी रहती थी। स्टूडियो के लोगों को परेशानी ना हो ये सोचकर मैंने उसे अपने पिता के घर रखवा दिया और देखिये तो दुस्साहस मेरे पिता फ़िरदौस से निक़ाह करने का सोचने लगे थे। मैंने सोचा जाने कौन से नक्षत्र में मैंने उसे अपने साथ रखने का सोचा, ख़ैर फ़िरदौस तो पराई थी।
मेरे अपने पैसों पर 25/30 परिवार पलते। चन्दन आते और ये देखकर कहते- क्या तुमने इतना बड़े कुनबे को पालने का ठेका ले रखा है, और मैं मुस्कुरा कर कहती- बचपन में एक-एक पैसों को तरसी हूँ किसी और का तरसना नहीं देख सकती।
एक भाई था रिश्ते में.. एक दिन आकर ज़िद करने लगा अपने स्टूडियो में कोई काम दिलवा दो। मैंने प्रोड्यूसर से बात की उसने 500₹ पर काम की बात की। मैंने सोचा मीना कुमारी का भाई 500₹ पर काम करेगा। मैंने अपना पर्स निकाला और 1500₹ देकर कहा आप उसे हर महीने 2000₹ दे देना बाक़ी का मैं आपको दे दूंगी, लेकिन उसे पता नहीं चलना चाहिए। लेकिन भाई ने तो इसका शुक्रिया तो दूर बल्कि ताना दिया था - बाईं जी, उस प्रोड्यूसर ने तो आपकी इज्जत भी नहीं रखी.. 2000₹ दिये.. मैंने ले लिए पर अगले बार से नहीं लूंगा कमसेकम दस हज़ार तो दिलवाओ।
एक वाक्या याद आ रहा है जब मीना कुमारी अस्पताल से जा रहीं थीं तो बाहर एक स्वीपर उन्हें देखकर दौड़के उनके पास गई और फिर लिपटकर उनसे फूट-फूट के रोने लगी। मीना कुमारी ने उसके सर पर हाथ रखा और उसे अपना पर्स दे दिया, उस पर्स में उनके जरूरी काग़जात और नक़द पैसे थे नजाने कितने। ऐसा था मीना कुमारी का दिल जो उस हालत में भी किसी को उदास नहीं कर सकती थी।
30 मार्च 1971 को रात-भर इंजेक्शन के कारण मीना कराहती रही.. कभी होश में तो कभी बेहोशी से।
31 मार्च की सुबह बदहवास से हुए कमाल सबसे कहते मेरी चंदा मुझसे दूर जा रही है कोई रोक लो उसे.. कोई रोक लो।
बाहर सेहरा बानो,गुलज़ार,कम्मो जैसे सैकड़ों फिल्मी सितारे मीना के ज़िन्दगी की दुआ कर रहे थे।
3:24 शाम को वो थोड़ी देर को होश में आई और फिर 3:35 में वो हमेशा-हमेशा के लिए हमें छोड़कर चली गई। 31 मार्च 1971 को मीना कुमारी हम सब से विदा ले गई।
और उनके विदा लेते ही पाक़ीज़ा ने वो लोकप्रियता हासिल की जो आज भी फिल्म जगत के लिए मील का एक पत्थर है। काश! मीना अपनी आँखों से ये मंज़र देख पातीं। मुंबई के रहमताबाद कब्रिस्तान में मीना और कमाल की कब्रें एक साथ है।
मीना अब हमारे पास नहीं है, लेकिन वो आज भी हमारे दिलों में हैं।

नितेश वर्मा 

तुम्हारे ख़त में

आपने देखा है उसे..?
उसे किसे.. और ये तुम हर वक़्त का मुझसे सवालें ना बुझाया करो, जो भी कहना है साफ़-साफ़ कहो।
अरे अम्मी! मैं और किसकी बात करूँगी और कौन है यहाँ.. ज़ारा को देखा है मैंने, वो नजाने कबसे छत को घूरे जा रही है.. और कुछ हल्के-हल्के गुनगुना भी रही है। मुझे तो कुछ गड़बड़ लगता है, आप चलकर देखिये।
मैं नहीं जा रही, उसके अब्बू आयेंगे तो वो उससे बात करेंगे अब वो मेरे वश से बाहर की बात है।
हें! ये क्या कह रहीं है आप? पता है आपको लड़कियाँ जब इस उम्र में आकर घंटों छत को देखा करें तो उसका मतलब क्या होता है?
क्या, मतलब होता है?
ये की उसके दिमाग में कुछ चल रहा है.. या तो मुहब्बत को लेकर या कोई ज़िन्न उसके शरीर में मौजूद हो गया हो।
लाहौल-बिलाक़ुव्वत ये कैसी बात कर रही हो.. ऐसे भी कोई अपनी बहन के बारे में बोलता है.. चलो दिखाओ मुझे कहाँ है वो..
आइये.. चलिये मेरे साथ जल्दी! उसे वहीं छोड़ दीजिए, अब जान थोड़े ही ना लेंगी जो चाकू लेकर चल रहीं है।
शशशश्शश! धीरे से - वो देखिये छत को देखकर कैसे गुनगुना रही है और अब तो जुल्फों को भी उंगलियों से लपेटे जा रही है, हाय-तौबा! अब आप कुछ जाकर उसे बोलेंगी। आप जाकर उसे देखिये मैं तब-तक मौलवी साहब को बुलाकर लाती हूँ
सुनो
हाँ! अब क्या है?
अपने अब्बू को भी फ़ोन कर देना मुझे तो ख़ुदा कसम बहुत डर लग रहा है। नजाने मेरी बच्ची को क्या हो गया।
ठीक है, पहले मौलवी साहब को बुला लूं।
अम्मी क़मरे में जाती है तो सुनती है ज़ारा कोई ग़ज़ल गुनगुनाएँ जा रही है -

तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किस का था
न था रक़ीब तो आख़िर वो नाम किस का था

वो क़त्ल कर के हर किसी से पूछते हैं
ये काम किस ने किया है ये काम किस का था

अम्मी ज़ारा के पास जाकर बोलती है -ज़ारा।
लेकिन ज़ारा ने कोई ज़वाब नहीं दिया और ख़ुद में मशगूल रहते हुए ग़ज़ल का अगला शे'र गुनगुनाने लगी -
वफ़ा करेंगे ,निबाहेंगे, बात मानेंगे
तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था
रहा न दिल में वो बेदर्द और दर्द रहा
मुक़ीम कौन हुआ है मुक़ाम किस का था
ज़ारा को इस हालत में देखकर लगभग अम्मी झल्ला गईं और जोर से चीख़ते हुए कहा -ज़ारा तुम्हें थोड़ा भी होश नहीं ये क्या कर रही हो?
ज़ारा ये सुनकर हड़बड़ा गई और तेज़ी से सोफे से उठकर बैठ गई और बड़ी मासूमियत से पूछा - क्या हुआ अम्मी?
ये सवाल तो मुझे तुमसे पूछना चाहिए था कि ये तुम सुबह से दीवार और छतों को क्यूं घूरे जा रही हो? क्या हो गया है तुम्हें? मुझे लगता है कि तुम्हारे दिमाग में अब तक उसका ख़्याल है या कुछ और?
ये कैसी बात कर रही है आप? मैंने ही उस दो कौड़ी के लड़के को मना किया था अब मैं ही उसे सोचकर मरती फ़िरूँगी.. आपसे ये किसने कह दिया। और तो और आपको कुछ पता भी है- मैंने सुना है कुछ दिनों पहले वो किसी और लड़की पर मुँह मार रहा था वो तो मैंने ठीक ही किया की उससे निक़ाह को मना कर दिया।
शर्म करो ज़ारा ये ख़्वातिनों के मुँह होते है क्या इस तरह हमारे घर की लडकियाँ बात करती है
उसे जो करना हो करें, तुम तो एक समझदार की तरह रहो।
हुम्मम।
अम्मी.. अम्मी.. मौलवी साहब आ गए?
मौलवी साहब? अभी! अभी क्यूं आएँ है? - ज़ारा ने चौंककर पूछा।
वो मैंने ही बुलाया था, मुझे कोई काम था।- अम्मी ने कहा।
पर आप कह रही थी अम्मी.. की.. मगर अम्मी ने सफ़िया को अनसुना कर दिया।
सफ़िया ज़ारा के क़मरे में ही रूक गईं।
अब तुम्हें क्या है ऐसे क्या घूर रही हो? -ज़ारा ने अपने बालों को बनाते हुए कहा।
कुछ नहीं बस यूं ही कहकर वो ज़ारा के पलंग पर लेट गई।
ज़ारा ने फ़िर अपनी छोड़ी हुई ग़ज़ल को वहीं से उठाया और दुबारा गुनगुनाने लगी-

न पूछ-ताछ थी किसी की वहाँ न आवभगत
तुम्हारी बज़्म में कल एहतमाम किस का था

हमारे ख़त के तो पुर्जे किए पढ़ा भी नहीं
सुना जो तुम ने बा-दिल वो पयाम किस का था

इन्हीं सिफ़ात से होता है आदमी मशहूर
जो लुत्फ़ आप ही करते तो नाम किस का था

सफ़िया ने ज़ारा को टोकते हुए कहा - तुम्हें पता है ज़ारा? वो आजकल क्या करने लगा है?
ज़ारा- कौन वो आवारा?
सफ़िया- अब वो ऐसा भी नहीं है। मैंने देखा है उसे हाय कितना प्यारा है।
ज़ारा- हाँ-हाँ, बको! आज क्या देख लिया तुमने उसमें।
सफ़िया- सुना है वो नौकरी करने लगा है और अब उसके घरवालों ने भी उसकी निक़ाह करने को सोचा है।
ज़ारा- तो तुम इतना क्यूं उछल रही हो? बोलो तो अब्बू से कहलवाकर तुम्हारा रिश्ता उसके घर भेज दे?
सफ़िया- हाय! ज़ारा तुम कितनी अच्छी हो। क्या तुम सचमुच में अब्बू से इसके बारे में बात करोगी?
ज़ारा- पछताओगी सफ़िया। तमाम उम्र ख़ुदको कोसती रहोगी.. उस फटीचर के पास कुछ भी नहीं.. और तो और मैंने सुना है कि कुछ दिनों पहले वो किसी और पे मुँह मार रहा था.. दोग़ला कहीं का.. पहले तो मुझसे इतनी मुहब्बत की बात कही.. वायदे किए.. और मैं जरा सा क्या मुकर गईं उसने तो अपना रंग ही बदल लिया।
सफ़िया- मुझे कुछ पता नहीं, तुम ये बताओ तुम अब्बू से मेरे लिये उसके घर रिश्ता भिजवाओगी, ना?
ज़ारा- तुम पाग़ल हो गई हो सफ़िया। क्या तुम उस लड़के से निक़ाह करोगी जिसे मैंने ठुकरा दिया हो और तुम क्या और भी कोई लड़की उससे निक़ाह क्यूं करेगी जिसे मैंने ठुकरा दिया हो। अभी तो निक़ाह कर लेंगी बाद में तमाम ज़िन्दगी रोती फिरेंगी।
सफ़िया- तुम मुझसे जलती हो ज़ारा! अग़र वो तुम्हारे लिए अच्छा नहीं तो इसका ये मतलब हरगिज़ नहीं की वो किसी के लिए अच्छा नहीं। तुम बात नहीं करोगी तो मत करो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता मैं ख़ुद अब्बू से इसके बारे में बात करूँगी।
ज़ारा- हाय अल्लाह! ये मैं क्या सुन रही हूँ। चलो मेरे क़मरे से निकलो तुम अभी।
सफ़िया- क्या हो गया है तुम्हें?
ज़ारा- चलो निकलो.. जल्दी करो और आइंदा कभी मेरे क़मरे की तरफ़ रूख़ मत करना समझी तुम?
सफ़िया- तुम होश में नहीं हो ज़ारा, कुछ सोच-समझकर बोला करो मैं तुम्हारी कोई मुलाज़िम नहीं जो जब चाहा.. जैसे जी आया इस्तेमाल कर लिया। बस बहन हूँ इसलिए चुप रह जाती हूँ, वर्ना ऐसे मुझे भी सुनाने आता है।
ज़ारा- तो जाओ ना उसे सुनाओ, जिसका मुहब्बत ये इतना सर चढ़कर बोल रहा है.. मेरे पास ये ग़म लेकर क्यूं आईं हो? मैं तुम्हारी कोई ग़मख़्वार नहीं जो तुम्हारे बोझ को हल्का कर दूंगी।
सफ़िया- हाँ तो जा रही हूँ उसी को सुनाने। ओह! देखो उसका फ़ोन भी आ गया तुम मेरे लिए बहुत लक्की हो, बाय।
ज़ारा- सफ़िया फ़ोन दो! मुझे उसका फ़ोन करना थोड़ा भी पसंद नहीं। लाओ दे दो.. ख़ामोशी से।
सफ़िया- मैं नहीं दे रही और ये फ़ोन उसने मेरे लिए किया है समझी तुम। कहकर सोफ़िया कमरे से बाहर निकल गई और ज़ारा के अधूरे ग़ज़ल को दुहराने लगी-

तमाम बज़्म जिसे सुन के रह गई मुश्ताक़
कहो, वो तज़्किरा-ए-नातमाम किसका था

गुज़र गया वो ज़माना कहें तो किस से कहें
ख़याल मेरे दिल को सुबह-ओ-शाम किस का था

सफ़िया के इस बर्ताव से ज़ारा झल्ला उठीं और  सामने रखा गुलदान उठाकर सफ़िया के दरवाज़े पर दे मारा पूरे क़मरे में शीशे के टुकड़े बिखर गए। सफ़िया हैरान हो गई और ज़ारा फिर से अपनी ग़ज़ल के शुरुआती शे'र को दुहराते हुए अपने क़मरे में चली गयी -

तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किस का था
न था रक़ीब तो आख़िर वो नाम किस का था

वो क़त्ल कर के हर किसी से पूछते हैं
ये काम किस ने किया है ये काम किस का था।

नितेश वर्मा 

क़िस्सा-ए-चैटिंग

हाय!
क्या कर रहे हो?
-हाय, दी!
-कुछ भी नहीं, आप बताइये।
हम्म्म।
और ये दी किसे बोल रहे हो?
-आपको..
क्यूं?
मैं तुम्हारी कोई दी-वी नही हूँ।
है नहीं तो क्या, हुम्ममह।
-लेकिन आप मेरी बहन की क्लासमेट है ना? तो उस नाते हिसाब से दी बोल दिया।
ग़लत बोल दिया, मैं तुम्हारी दी नहीं हूँ।
फेसबुक पर भी दी ही बनाने के लिए फ्रेंड़ बनाया है क्या बुद्दू?
-रिक्वेस्ट आपने किया था।
अरे चलो! फिर ऐड क्यूं कर लिया। मुझे दी मत कहा करो। फेसबुक पर फ्रेंड्स होते है या समथींग लाइक..
-समझ गया।
क्या?
-माँ बुला रही है, मैं उन्हें सुनके फिर दूबारा आता हूँ, बाय।
ओके! और अबसे दी मुझे मत कहना।
जल्द आना, मैं इंतज़ार कर रही हूँ।
अगले दिन सुबह तक- नो रिप्लाइ
हाय!
दोपहर में तक भी- नो रिप्लाइ
अग़ेन हाय!
शाम में- नो रिप्लाइ
हाय!
दो-तीन दिन तक कोई ज़वाब नहीं, कोई चैटिंग नहीं।
चौथे दिन लड़के के घर पर-
ओह! आज कैसे आ गई?
बस यूंही।
और सब बताओ, कैसा है?
सब बढ़िया। तुम्हारा भाई नहीं दिख रहा कहीं, उम्म्म?
अरे! वो तुम्हारा भी भाई है जो बात करना चाहो जाकर कर लो, अपने रूम में ही होगा।
वो मेरा भाई नहीं है, समझी तुम?
अरे! क्या हो गया है तुम्हें? उसने कुछ किया है क्या?
नहीं वो ऐसे ही, चलो मैं उससे मिलकर आती हूँ।
चल ठीक है, मिल आ।
अच्छा बच्चू। यहाँ चैटिंग चल रही है, ज़रा देखूँ तो कौन है महारानी?
-कोई नहीं है, बस ऐसे ही कॅालेज़-फ्रेंड है।
कॅालेज़-फ्रेंड है? बच्चू मैंने भी कॅालेज़ किया है, मुझे सब पता है..
और यहाँ मुझे चैट आफ करके कहीं और गुलाब बरसाया जा रहा हैं, उम्म्म?
-सॅारी दी।
हुम्मम।
माफ़ कर दूँ? वो भला क्यूं? फिर से तुम चैट आफ कर दोगे, और फिर से मुझे बारिश में भींगते हुए यहाँ आना पड़ेगा।
-सॅारी दी। अबसे कभी नहीं होगा। देखिये, मैंने चैट अब आन भी कर दिया है।
हुम्मम, चलो इस बार माफ़ किया।
और ये दी-दी क्या लगा रक्खा है? कितनी बार मना किया है मैंने? मुझे दी कहकर मत बुलाया करो, समझे?
-फिर क्या कहकर बुलाऊँ?
मेरा नाम लेकर पुकारो।
-अच्छा नहीं लगता।
लगेगा.. पहले तुम पुकार कर तो देखो।
-ठीक है।
पुकारो फिर..
-शर्म आ रही है। आपके सामने कैसे..
भाग! बेवकूफ़। लेकिन याद रखो अबसे मैं तुम्हारी कोई दी-वी नहीं हूँ और ना ही तुम कभी मुझे इस तोते मैना वाले सीन में आकर इग्नोर करोगे।
ओके?
-ओके डन।
चलो मैं तुम्हें एक क़िस्सा सुनाती हूँ -
-अभी?
अभी नहीं तो कब?
सुनो चुपचाप।
-हुम्मम।
एक बार एक प्रेमिका अपने प्रेमी से बोलती है- मुझे वो तीन जादुई शब्द तुमसे सुनने है क्या तुम वो मेरे लिए बोलेगे?
प्रेमी बोलता है- हाँ, बिलकुल क्यूं नहीं?
प्रेमिका- तो फिर बोलो, मैं सुन रही हूँ।
प्रेमी- ॐ भट् स्वाहा।
प्रेमिका- धत तेरे की।
-हाहा..हाहा!
अच्छा था ना?
-क़िस्सा बोल के ज़ोक सुना दिया।
तुम्हें यहाँ नहीं समझाया जा सकता, मैं जब मैसेज करूँ तो रिप्लाइ फ़टाक से करना, देर नहीं होनी चाहिए थोड़ी भी।
चलो घर पहुँच कर मैसेज करती हूँ, रिप्लाइ तुरंत आ जाना चाहिए, ओके?
-ओके, दी।
हुम्मम, फिर से।
-सॅारी

नितेश वर्मा 

बस के पिछले विंडो सीट वाली लड़की

उसको देखकर हमेशा ये लगता रहा था कि - काश! कभी वो उन बस की खिड़कियों से एक बार मेरा नाम पुकार दे, कभी उस शर्मिंदगी से परे होकर कोई चुम्बन मेरी तरफ़ उछाल दे या कभी अपनी नज़रें झुका के कोई ख़त मेरी तरफ़ गिरा दे। मैं अक्सर बेसबब उसके इंतज़ार में रहता था, उस बस के इंतज़ार में, उस खिड़की को मैं बार-बार देखना चाहता था.. जितनी बार भी वो वहाँ नज़र आएँ मैं भी वहाँ मौजूद होना चाहता था।
मुहब्बत इतनी आसान नहीं थी फ़िर भी उसका हो जाना भर सबकुछ आसान कर देता है। मेरी मुहब्बत भी कुछ ऐसी ही ढीठ तरीके की तरह थी। मैं बार-बार उसे देखता था और वो हर बार अपनी जुल्फ़ों को सुलझाती रहती थी, कभी-कभार उन जुल्फों से थक-हारकर वो उन्हें अपने कानों के पीछे ले जाकर छोड़ आती, जैसे किसी बेफ़िक्री से उसे राहत मिल गई हो। मैं शर्मीला नहीं था लेकिन डरपोक ज़रुर था, मैं उससे कई दफ़ा इश्क़-ए-इज़हार करना चाहता था मग़र उसको खो देने के डर से मैं कुछ कह नहीं पाया। ना तो तब ही हिम्मत थी और ना ही अब हुई है, हर दफ़ा ऐसे हज़ारों ख़त उसके नाम पर लिखता हूँ, लेकिन आज तक कभी भेज नहीं पाया हूँ। उससे मुहब्बत है ये बता नहीं पाया हूँ। वो फ़िर भी चली गई, मेरे इतने सजग होने के बावजूद भी, मेरे डर का उसपर कोई असर नहीं हुआ या शायद उसे जाना ही था, मैं मुहब्बत का इज़हार करता तो भी और नहीं किया तो भी। वो एक हसीन ख़्वाब है जो चले जाने के बाद भी हर रोज़ याद आ जाती है, वो बस वाली लड़की अग़र अब कहीं मिली तो साफ़-साफ़ कह दूँगा - मैं तुम्हें ताउम्र सड़क के किनारे से देख सकता हूँ, बस अब कभी मुझे ऐसे अकेला छोड़कर मत जाना।

नितेश वर्मा 

पगलिया

उसे नहीं पता था इस तरह चलकर वो आख़िर कहाँ तक पहुंचेगी.. और कहीं पहुंचेगी भी या नहीं, उसे कुछ पता नहीं था मग़र अब वो रुकना नहीं चाहती थी। वो नहीं चाहती थी कि उसे फ़िर कोई उसी दलदल में घसीट कर ले जाएं जिससे अभी-अभी किसी तरह से वो जान बचाकर भाग आयी है। वो अब नहीं चाहती थी कि वो कभी पीछे मुड़कर देखें और वैसे भी पीछे मुड़कर देखने पर अक़सर रुसवाईयाँ ही हाथ आती है, और कुछ नहीं।
रात हो चुकी थी और रात में ऐसे लड़की का सड़क पर अकेले होना मुनासिब नहीं, चाहें वो किसी भी परिस्थिति में हो उससे भी ज्यादा हालात से मारे कुछ लोग अपनी तलब और इच्छा को लेकर उससे अपना काम निकलवाना जानते हैं। वो भले से उम्र में अभी सोलवहाँ सावन नहीं देख पायी थी, मग़र उसे इन सभी चीज़ों का इल्म अब तक हो चुका था। वो अब ज्यादा भाग नहीं सकती थी, पेट के आग ने उसे वही सड़क किनारे एक कोने पर बिठा दिया। पहले तो रुककर बहुत हाँफ़ना चाहती थी, फ़िर रोना चाहती थी, फ़िर उस दरवाज़े पर बाहर से ताला लगवाना चाहती थी जो उसने अक़सर सुबह में अंदर से लगते हुए देखा था। मग़र अभी कुछ भी उसके मुताबिक़ नहीं था, इसलिए वो फिर उठकर चलने लगी। थोड़ी दूर चलने पर पता चला ये दिल्ली शहर है और दिल्ली में आजकल लोग काफ़ी संवेदनशील होने लगे हैं। मदद की गुंजाइश थी और उसने गुहार भी लगा दी - कोई मेरी मदद करो।
मदद तो नहीं अलबत्ता एक राहगीर उसकी तरफ़ चला आया।
क्या मदद चाहिए आपको?
मुझे बहुत भूख लगी है, कुछ खाने को मिल जाएं तो आपकी बहुत कृपा होगी।
ये दिल्ली है, यहाँ मुफ़्त में कुछ नहीं मिलता। अग़र मैं तुम्हें खाना दूं तो तुम मुझे क्या दोगी?
उसने कुछ नहीं कहा, बस ख़ामोश रही। अक़सर ख़ामोशी ही कई बार कई सवालों का हल होता है, ख़ामोशी से ही कोई राह निकल आती है। मग़र उसकी ख़ामोशी ने कुछ असर नहीं किया।
फ़िर से वही सवाल - उम्म्म! तुम बदले में क्या दोगी मुझे।
उसने कुछ नहीं कहा और फ़िर ख़ुदको सँभालकर भागने लगी, कुछ दूर तक उस राहगीर ने उसका पीछा किया फ़िर जब देखा कि वो किसी चुनावी पार्टी के कस्बे में पहुँच गई है तो वो लौट गया।
वो रुककर हाँफ़ने लगी, कुछ देर बाद नज़र उठाकर देखा तो एक नौजवान लड़का उसके सामने खड़ा था। उसने उसे देखा और उसके हाथ से बोतल छीनकर पीने लगी, जब प्यास बुझ गईं तो फ़िर बोतल उस लड़के के मुँह पर मारा और भागने लगी, लड़के ने उसका पीछा नहीं किया बोतल उठाई और फ़िर वो अपनी पार्टी की तरफ़ लौट गया।
कुछ देर और भागते-भागते वो एक कार से जाकर टकरा गईं और बेहोश हो गई। होश जब आयी तो उसने ख़ुद को एक खंडहर में पाया, कपड़े सही-सलामत थे। पहले पूरा बदन साफ़ किया फ़िर कपड़े उठाकर पहने और ख़ुद को सँभालती पुलिस चौकी पहुंच गई। थानेदार साहब नहीं थे, इंतज़ार करना पड़ा। ख़ैर और कोई काम भी नहीं था तो उसने इंतज़ार किया। सुबह से शाम हो गई थानेदार साहब नहीं आएँ। रात के क़रीबन 10 बजे मुलाक़ात हुई। थानेदार ने बात सुनी और दो-चार गाली देकर उसे थाने से बाहर करवा दिया। वो रोती हुई फ़िर बाहर आ गई।
सुबह से रात तक पूरा दिन बिताने के बाद जब वो बाहर आयी तो लगभग चौंक सी गई। समाचार में ख़बर आ रही थी कि एक सामाजिक संस्था ने कुछ लड़कियों को उस दलदल से बचा निकाला है, जहाँ ज़बरन उन्हें देह व्यापार करना पड़ता था, उन्हें यातनाएं दी जाती थी। इन संस्थाओं का उद्देश्य ही स्त्री-रक्षा है, स्त्रियों के सम्मान में ही देश का सम्मान है।
यह सब सुनकर वो अपना होश खो बैठीं और सड़क किनारे पड़े पत्थर को उठाकर टीवी पर मारने लगी। लोगों ने भी भरपूर ज़वाब दिया और उसे अधमरा कर दिया, बाद में किसी बुजुर्ग ने सुझाया बेचारी पाग़ल है, छोड़ दो उसे। उसे अच्छे-बुरे का फ़र्क़ नहीं है इसलिए ऐसा कर रही है। लोगों ने भी यह कहानी सुनकर कुछ रहम दिखाई और तरस खाकर उसे छोड़ दिया।
वो उठकर अब बैठ चुकी थी, उसे अब समझ आ चुका था वो पहले कमरे में कैद थी जहाँ हर रोज़ ज़िस्म बेचने पर पेट पल जाया करती थी और अब इस पुरुष-प्रधान समाज में कैद है जहाँ हर रोज़ ख़ुदको बेचकर भी वो एक न्याय नहीं ले सकती। वो हताश हो चली थी, सामने से बच्चे उसे पगली-पगली बुला रहे थे, कुछ इज्जतदार लड़कियां उसके मुँह पर ईटें फ़ेंककर उसका बहिष्कार कर रही थी, तो कुछ बड़े-बुजुर्ग उसपर थूकते और आगे बढ़ जाते।
अब वो लौट जाना चाहती थी जहाँ से वो ख़ुद को बचाकर यहाँ ग़लती से ले आईं थी, एक उम्मीद से कि कमसेकम कुछ लोग यहाँ होंगे जो उसके दर्द को अपना समझकर उसके लिए कुछ करेंगे, मगर वो ग़लत थी। और गलतियों का समाधान अकसर लौट जाना ही होता है, ये उसे पता था। अब वो उठकर फ़िर से उसी जहन्नुम में जाने को तैयार हो गई थी। इस कोलाहल को देखकर थानेदार की गाड़ी वहाँ नज़र भर को रुकी। मामलात जानने के बाद पूछा -कौन है वो?
ज़वाब आया- पगलिया है साहब!
उसने मुड़कर पीछे भी नहीं देखा और ख़ुद को किसी तरह घसीटते सड़क पर भागी जा रही थी किसी और जहन्नुम में जाने को मग़र इस जहन्नुम से दूर.. बहुत दूर।
बच्चे अभी भी पगलिया-पगलिया चिल्ला रहे थे, थानेदार साहब की गाड़ी ने सायरन दिया और फिर तेज़ी से निकल गई। सुबह के थके कुछ लोग उस पगलिया के पीछे हो लिए।

नितेश वर्मा

लाइसेंस

उस दिन शाम कुछ ज्यादा ही लम्बी हो गई थी। रोजे का वो आखरी दिन था, हमज़ा आज कैसे भी करके जल्दी घर पहुंचना चाहता था, मग़र उसके मालिक ने उसे सख़्त हिदायत दी थी कि वो चाहे कुछ भी करे आज शाम तक उसे ये काम ख़त्म करना ही होगा। काम कुछ उतना बड़ा भी नहीं था, ये काम तो हमज़ा 17 सालों से कर रहा था, जब वह 7 साल का था तो अपने अब्बू के साथ यहाँ पत्ते बनाने आया था। इस काम में हमज़ा माहिर था, मग़र अक़सर इंसान सबकुछ समझते-जानते हुए भी मूक बन जाता है, ठीक वही हाल आज हमज़ा का था। रोजे में आये दिन गर्मी बढ़ने लगती है, इफ़्तार का बंदोबस्त भी करना कोई आसान काम नहीं होता। हमज़ा के अब्बू पत्ते बनाते-बनाते कब तम्बाकू के आदी हो गए ये उन्हें भी नहीं पता था। हमज़ा इस रोजे के दिन में भी भर दिन मज़ूरी करता और शाम को जो पैसा मिलता उसे हर सप्ताह घर को भिजवा देता। उसके अब्बू की हालत दिन-ब-दिन गिरती चली जा रही थी और इधर इस काम को दिन-रात एक करके भी करने पर उतनी भी तनख़्वाह नहीं मिलती जिससे उसके घर का भी ख़र्च चले। हमज़ा इस रोज़ कुछ ज्यादा ही परेशान चल रहा था.. कारण उसकी मुहब्बत इल्मा थी, जो हमज़ा से बेइंतहा मुहब्बत करती थी। कुछ दिनों पहले इल्मा का एक ख़त आया था उसमें उसने लिखा था - हमज़ा अब गाँव में कुछ रहा नहीं, ना ही तुम यहाँ हो और ना ही मुझे कोई समझने वाला। घरवालों ने दूर के एक रिश्तेदार के बेटे से मेरी मंगनी तय कर दी है और साथ-साथ ये हिदायत भी दी है कि मैं तुम्हें भूल जाऊँ। क्या मैं तुम्हें भूल जाऊँ? क्या किसी को प्यार करना और फिर उसे भूलाना इतना आसान होता है। मेरे पास और कोई दूसरा चारा नहीं है, इसलिए मैंने सोचा है कि मैं ठीक मंगनी के दिन ख़ुदकुशी कर लू्ंगी। अग़र मैं तुमसे नहीं मिल पाई तो क्या मौत से जरूर मिल जाऊँगी। तुम्हारे इंतजार में मैं तब तक ख़ुद को ज़िंदा रखूँगी हो सके तो मुझे बचा लेना - तुम्हारी इल्मा।
हमज़ा पत्ते बनाता और सोचता रहता वो क्या करे। अपने अब्बू का इलाज कराएँ या यहाँ शह्र में एक झोपडी बनाकर अपने घरवाले को यहाँ ले आए या फ़िर उस ख़ानदानी महल से जाकर इल्मा को बचा लाए। इल्मा से उसका प्यार बस प्यार नहीं एक इबादत था, वो ख़ुदसे भी ज्यादा किसी को चाहता था तो वो इल्मा थी।
आज हमज़ा गाँव जाने वाला था, उसने इल्मा को अपने साथ शह्र लाने का सोच लिया था, मग़र कैसे? वो शह्र लाकर इल्मा को रखेगा कहाँ? अपने दो बहनों, अब्बू-अम्मी के ख़र्च के साथ क्या वो इल्मा का ख़र्च भी उठा पायेगा। हमज़ा मग़र इन सभी बातों को सोचना भी नहीं चाहता था, आगे जो होगा देख लेंगे के पुल को बांधकर वो गाँव पहुँचा और देर रात अपने परिवार के साथ इल्मा को लेकर शह्र आ गया।
कारखाने के एक साथी ने कुछ मदद की और उसे एक शह्र से दूर एक बस्ती में एक कमरा दिला दिया। कुछ दिनों बाद इल्मा के घरवाले उसे तलाशते उस बस्ती तक जा पहुंचे, मग़र इल्मा ने उनके साथ जाने को मना कर दिया। बस्तीवालों के सामने उनकी एक ना चली और फिर वो मन मसोसकर गाँव को चले गए।
धीरे-धीरे दिन बीतने लगे, कुछ दिनों बाद हमज़ा ने अपना एक छोटा सा कारखाना खोल लिया। मग़र अब्बू की हालत बदतर से बदतर होती जा रही थी, सुबह हमज़ा उनका इलाज़ करवाता और शाम को तम्बाकू खरीद के ले जाता। उनकी तड़प और ललक देखकर वो अंदर तक जा बैठता। लत ऐसी चीज़ है, अग़र वो किसी को पकड़ ले तो उसे उसके मरने पे ही छोड़ती है। समय बीता, अब्बू इंतकाल फ़रमा गए। हमज़ा ने हौसले से काम लिया, घर-कारखाने को संभाला और धीरे-धीरे फिर दिन बीतने लगे, अब कारखाना एक स्थायी रूप ले चुका था, दूर-दूर से लोग हमज़ा से व्यापार साझा करने लगे। परंतु, ख़ुदा के मर्जी के आगे किसी की नहीं चलती, एक दिन हमज़ा व्यापार के मामले में शह्र से बाहर जा रहा था तो कुछ लोगों ने रास्ते में उसे घेर लिया और उससे उसकी सारी चीजों को छीन कर उसे मार दिया। इल्मा को इस वाकये को लेकर काफ़ी गहरा सदमा लगा और वो लगभग टूट सी गई। मग़र हमज़ा के गुजर जाने के बाद उसके परिवार का पूरा भार इल्मा के कंधों पर आ गया था और वो इससे मुकरना नहीं चाहती थी और इसमें कोई शर्मिंदगी की बात भी नहीं थी, वो हमज़ा के कारखाने को संभालने लगी और फ़िर धीरे-धीरे दिन सुधरने लगी। इल्मा ने हमज़ा के दोनों बहनों की रूख़सती भी कर दी, कारखाना फ़िर पुराने दिनों की तरह चलने लगा।
एक दिन शह्र के कमेटी वालों ने इल्मा को सभा में बुलाया और उसके इस व्यवसाय पर रोक लगाने को कहा। उनके माशरे में ऐसे औरतों का काम करना और हर रोज़ आगे बढ़ना नाज़ायज है, इसमें व्यवसाय के अंदर और भी कामों का मिलावट साफ़ लगता है।
इल्मा ने कमेटी वाले को कहा - लेकिन इसमें ग़लत क्या है? मैं अपने पति के व्यवसाय को संभाल रही हूँ उससे अपनी रोज़मर्रा को चला रही हूँ। क्या औरतों का बाज़ार में खड़ा होना ग़लत है क्या?
हाँ, बिलकुल ग़लत है, कल से हम आपका लाइसेंस कैंसल कर रहे आप जा सकती है। मग़र मैं इसके बाद क्या करूँगी? आप ऐसा नहीं कर सकते है।
आप बाज़ार से कमाइये, बैठ जाइये बाज़ार में जाकर, वहाँ कमाई भी ज्यादा होती है।
इल्मा ने कुछ नहीं कहा और चली गई।
अगले दिन दो ख़त आएँ, एक में कारखाने के लाइसेंस कैंसल की बात थी और दूसरे में देह व्यापार करने का लाइसेंस।

नितेश वर्मा

श्रीकृष्ण का ज्ञान

महाभारत के युद्ध का वक़्त था। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के दलीलों से हारकर अपना विराट रूप दिखा चुके थे, अब मायूसी से पूरी दिन ना गुजरने के ख़ौफ़ से बचने के लिए भगवान ने बगल के ठेकेवाले से एक चाय उधार कर ली, और वही रथ एक तरफ़ लगाकर चाय पीने लगे। चिलचिलाती दोपहरिया और भगवान श्रीकृष्ण हताश होकर चाय पीये जा रहे थे। अर्जुन का मन यह देखकर द्रवित हो उठा, तभी एक तीर आकर अर्जुन के धनुष को उनसे अलग कर देता है। हताश व्यक्ति पहले ही एक ग़म से जूझ रहा होता है और ऊपर से ये सामाजिक प्रातनाएँ उसके स्वभाव को और भी आक्रामक बनाती रहती है। अर्जुन एक प्रार्थी के भाँति भगवान श्रीकृष्ण के सामने अपने घुटने को ज़मीन से टिकाकर दोनों हाथों को जोड़कर ज्ञान के मार्ग का माँग करने लगे। तब भगवान श्रीकृष्ण ने चाय को एक तरफ़ किया, थोड़ी देर के राहत के लिए सूर्यदेव ने भी अपना तपिश कम किया। फ़िर भगवान श्रीकृष्ण रथ पर खड़े होकर अर्जुन को समझाने लगे- हे पार्थ! आज ये जो महाभारत हो रहा है उसके पीछे एक प्रयोजन है। पाप और पुण्य के बीच का ये संघर्ष है, नीति-अनीति के विरुद्ध ये युद्ध है, ये युद्ध स्त्रीयों के आत्म-सम्मान के लिए है, अपने हक़ के लिए है। इस युद्ध का हो जाना ही सही है, अग़र यह युद्ध यहाँ रूक गया तो सब अपने -अपने हक़ से वंचित रह जायेंगे।
हे पार्थ! एक दिन ऐसा भी आयेगा जब लोग निजी स्वार्थ के लिए ऐसे युद्ध करवाऐंगे। लाखों लाशें बिछाऐंगे और उनके चेहरे पर तनिक भी शर्मिंदगी नहीं रहेगी। ये कलयुग में सरकारी नेता या सरकारी समूह के नाम से जाने जाऐंगे। तो, हे पार्थ! मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ - तुम अपने कर्तव्य का पालन करो और इन सबको इस दुष्कर्म से मुक्त करो।
भगवान श्रीकृष्ण के इस ज्ञान को पाकर अर्जुन ने बगल के ठेकेवाले से दो चाय उधार लेकर पी और फ़िर अपने धनुष को लेकर युद्ध में अपनी युद्ध-कौशल दिखाने लगे। शाम तक भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के मुख पर एक अज़ीब शांति आकर बैठ गई थी। बस ज्ञान मात्र से कुरीतियों का नाश करके आज अर्जुन बहुत खुश थे और उनके बग़ल में खड़े भगवान श्रीकृष्ण मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे। अब आकर चायवाले को भी यक़ीन हो गया था कि अर्जुन यह युद्ध जरूर जीत जायेंगे और जीतने के बाद सारी उधारी वापस हो जायेगी साथ में यह ज़मीन भी उसे मिल जायेगी। युद्ध का पहला दिन बीत गया और सब अपने-अपने शिवीर कक्ष में आराम करने को चले गए थे। बस, बारबरीक आज की जनता की तरह पूरी रात उस पहाड़ पर बीताता है, बस कल के शेष युद्ध को देखने के लिए।

जय श्रीकृष्ण।

नितेश वर्मा

पापा! इस बार 100 ₹ एक्सट्रा चाहिए

बात अकसर किसी बात पर ही उठ जाती है, कोई मौसम आ गया तो कोई बात छिड़ गईं, कोई समां बंधा तो कोई बात-बहस हो गई, और कुछ ना हुआ तो सोशल-मीडिया के चक्कर में थोड़ी देर बैठ गए फ़िर बात ही बात..बहस ही बहस। ठीक उसी तरह किसी ने आज ये याद दिलाया तो पितृत्व-भक्ति भी जग गईं। हालांकि मेरा, मेरे पापा से लगाव बिलकुल ना के बराबर है, आज भी महीनों हो जाते हैं मैं उनको फोन कर ही नहीं पाता। ख़तों का अब कोई सिलसिला हैं नहीं। पहले ये अकसर हुआ करता था, उस ज़माने में जब मैं अपने शह्र से दूर इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था तब। आदतन या मजबूरन मैं हर दफ़ा अपने दोस्तों से कुछ उधार कर लेता और ठीक उसी समय पापा के नाम एक ख़त लिखता- पापा! इस बार 100 ₹ एक्सट्रा चाहिए। और अपने शह्र को भेज देता था और पापा हर बार की तरह बिना कुछ बोले या पूछे वो 100 ₹ मेरे महीने के ख़र्च के साथ में भेज दिया करते। मुझे कभी -कभी इस बात की बहुत कसक हुआ करती मग़र फ़िर सोचता ये तो हर पिता का कर्तव्य होता है कि वे अपने बच्चों की जरूरतों को पूरा करे। उस वक़्त ना तो उतना दिमाग ही हुआ करता था और ना ही ये सब सोचने का समय। आज जब भी कभी उन अतीत के पन्नों में खोने को चला जाता हूँ, ख़ुद को एक कर्ज़ में पाता हूँ। मैं हर दफ़ा ये कोशिश करता हूँ कि किसी भी तरह उन कर्ज़ों को कम करू, इसलिए कभी-कभार कोई कहानी लिखकर पेश कर देता हूँ, कोई ग़ज़ल बुन लेता हूँ। मग़र उन्हें ये सब कभी दिखाने का मौका नहीं मिला। अब इतनी हिम्मत भी नहीं रही की जाकर इन सभी को पापा को सुनाऊँ। हालात आज काफ़ी मुख़्तलिफ है, कभी फ़ुरसत नहीं मिलती तो कभी हिम्मत हार जाती है। मग़र आज भी ये दिल कोशिश करता है, कभी एक ज़िद को लेकर बैठ जाता है कि फ़िर कोई एक ख़त लिखूँ पापा के नाम और अपने शह्र को भेज दूं कि - पापा! इस बार 100 ₹ एक्सट्रा चाहिए।

#HappyFathersDay
नितेश वर्मा

जाने वो कौन थी

शाम हो चुकी थीं.. रात ने भी अब दस्तक दे दी थी। शहर की सारी बेताबियां को जैसे समुंदर ने खुद में समेट लिया हो। हवाएं हल्की शोरों के साथ बेबाकी से बहती चली जा रही थी। दिन भर की प्यास को मिटाने के लिये समुंदर के करीब पहुँचा तो देखा खुद समुंदर अपने सारे पानी को नाजाने किस नाराजगी से ख़ारा करके बैठा है। उससे असीम दरियाओं की प्यास बुझायी जा सकती है, मगर ऐसा लगता है किसी ने यहां आकर अपने सारे के सारे आँसू छिपा दिये हो और वो मूक उसे खुद में समेटकर पल-पल तिलमिला रहा हो।
अकसर जब कुछ नहीं होता है तो भी कुछ ना कुछ होता है, नज़र जब कुछ देखना ना चाहें फिर भी कुछ ना कुछ देख ही लेती है और जब आपकी जिन्दगी में मुहब्बत ना हो तो वो मुहब्बत भी ढूंढ ही लेती है ठीक वैसे ही किसी खामोश सी जगह कोई सिंसकी भी चली ही आती है। अभी समुंदर की लहरों को देखकर कुछ समझने की कोशिश मैं कर ही रहा था कि एक लड़की की रोने की आवाज़ आयी। वो खूबसूरत थी, जुल्फे घनी और बड़ी बड़ी आँखें जैसे एक बार में ही एक दरिया भर के आँसू को आँखों से बहा देती हो। जाने क्या मुझे उसके करीब खींच के ले गया शायद वो रो रही थी तो मेरा हमदर्द दिल उसे सँभालने चला गया हो या उसकी रोने की आवाज़ से उकता कर उसे दिलासा देने। बात जो भी हो मैं उसकी ओर खींचा चला जा रहा था। थोड़ी देर बाद मैं उसके करीब था, मैंने उससे पूछा - आप कौन है? और इस वक्त यहाँ बैठकर रो क्यूं रही है।
उसने मेरी बातों का कोई जवाब नहीं दिया बस उन बड़ी बड़ी आँखों को उठाकर मुझे बस देख भर लिया था, उन आँखों में आंसू कुछ ऐसे भरे थे कि अगर उन्हें वो गिरा दे तो पूरी की पूरी शहर उसकी बारिश में भींग जाती कमसेकम मुझे तो बिलकुल ऐसा ही लगता है। उसने अपने आँसूओं को पोंछते हुए कहा - रोने का भी कोई वक़्त होता है?
मैंने खुद को सँभालते हुए कहा - हाँ, बिलकुल होता है, आपको लगता है इसके बारे में किसी ने कभी बताया नहीं।
नहीं, सचमुच नहीं बताया किसी ने -उसने कहा।
क्यूं क्यूं नहीं बताया किसी ने, आप करती क्या हो? - मैंने पूछा
मेरा अपना कोई है ही नहीं, मैं तो अकेली हूँ इस दुनिया में। मुझे ये सब कौन बतायेगा? - उसने कहा।
इस दुनिया में कोई अकेला नहीं होता, ऊपरवाला किसी को भी अकेला नहीं रखता। बस कुछ लोग खुद ब खुद सबकुछ अपने आप से अलग कर देते है। - मैंने एक संजीदगी भरा जवाब दिया।
वो मुझे हैंरत भर के देख रही थी। फिर उसने कहा - वो मुझसे प्यार नहीं करता?
कौन कौन नहीं करता, आप तो माशाअल्लाह इतनी खूबसूरत है, मैं नहीं मानता.. शायद आप किसी गलतफ़हमी में है.. आपसे तो कोई भी प्यार कर सकता है आप तो इतनी खूबसूरत है। - मैंने एक साँस में ही भाव विभोर होकर सारी बातें कर दी।
फिर वो क्यूं नहीं समझता ये, हर रोज़ मैं उससे मिलना चाहती हूँ.. कुछ पूछना चाहती हूँ.. कुछ सुनाना चाहती हूँ.. मगर वो तो कभी आते ही नहीं। - उसने कहा।
हुम्मम! ऐसा क्या हुआ था.. आप दोनों के बीच? - मैंने गंभीर होकर पूछा।
पता नहीं, कुछ पता नहीं चलता। - उसने बड़ी बदतमीज होकर कहा।
कुछ देर मैं खामोश रहा और जब मुझे ये बात समझ में आ गयी की इंसान अकसर परेशानी में बदतमीज होकर कुछ कर गुजरता है तो फिर उससे दूबारा बात शुरू की।
तो आप मुझे बताइये आप परेशान क्यूं है। शायद मैं आपकी कुछ मदद कर सकूँ। - मैंने कहा।
नहीं, अब रहने दीजिए। अब कोई बात नहीं अब तो मैं संभलने भी लगीं हूँ। यहाँ रोज़ आना अच्छा लगने लगा है.. बस सुकून से दो पल रो लेती हूँ तो लगता है जैसे सदियों सदियों का बोझ सीने से उतर गया है। - उसने कहा।
इतनी छोटी उम्र और इतने बड़े बड़े एहसासात। किसी और ज़माने की लगती है आप। - मैंने थोड़ा मज़ाकिया होते हुए कहा।
उम्र का अनुभव से क्या मामला, अनुभव तो वक़्त कराता है। - उसने फिर एक बार खुद को संजीदा बतलाते हुए बताया।
चलिए! फिर कुछ ना सही, दोस्त ही बन जाते है। - मैंने बेशर्म होकर कहा।
मैं आपको जानती भी नहीं और ना ही आप मुझे, फिर ये पहचान क्यूं? - उसने पूछा।
पहचान नहीं है, इसलिये ही तो दोस्त बनाने को कहा। अंजानों से अकसर दोस्ती हो ही जाती है। - मैंने कहा।
नहीं! क्या पता कल से मैं यहाँ आ भी पाऊँ या नहीं.. कल से फिर कभी हम मिल पाएँ भी नहीं
.. क्या पता कल क्या लेकर आए? - उसने मेरी आँखों में देखकर कहा।
ऐसा कुछ नहीं होगा। - मैंने दिलासा दिलाया।
क्यूं फिर आप अपने घर नहीं जाऐंगे, जहाँ की दुनिया आपकी इंतजार कर रही है। आपके अपने तो हर रोज़ आपको बुलाऐंगे। - उसने तो जैसे कोई दबी बात कह दी हो और मैं बस हैरान होकर उसे देखता चला जा रहा था।
आप अपने अपनों का ख्याल कीजिए, सबको ये खुशी नहीं मिलती। कुछ लोग बहोत से खुशियों से ताउम्र महरूम ही रहते है। - उसने कहा।
मेरा इस दुनिया में कोई नहीं, इसलिये मैं अकसर किसी खुशी के माहौल में दुखी हो जाती हूं। - उसने कहा।
मैंने उसकी हाथों को अपने हाथों में थाम लिया ये कहते हुए - मैं हूँ ना।
वो कुछ देर खामोश रही फिर मेरी हाथों से अपनी हाथों को छुड़ाकर कहा, पर मैं किसी और की हूँ.. और वो एक बहती हवा के साथ गायब हो गयी।
मैं उसे देखता रहा.. और वो चली गयी, जाने वो कौन थी।

नितेश वर्मा 

हैप्पी होली

अभी पिछले बरस की गुलाल उतरीं ही नहीं थी.. रंग जो चढा था वो अभी भी ठीक से निकल नहीं पाया था- कि फिर ये होली आ गई। फिर से किसी की जिद थी चूनरी भिंगोने की, इन गालों को छू लेने की, बंधी इन जुल्फों को खोल देने की, इन नर्म उंगलियों को थाम लेने की, मेरे बचती-बचाती नज़रों में खुद को कहीं देख लेने की।
मगर अब मैं नहीं चाहती भींगना और ना ही किसी के रंग में रंगना चाहती हूँ। मैं अब उगता गईं हूँ हर बार की इस हैप्पी होली से। किसी की जाम में नहीं उतरना चाहती, पर्दे के पीछे से कुछ नहीं छांकना चाहती। अब मैं नहीं चाहती कोई भी हैप्पी होली, जो मुझमें मनाई जाएं.. मेरी नामंजूरी के बावजूद भी। ख़ैर आपको हैप्पी होली हर दफा की तरह इस बार भी बिना किसी गुलाल के.. बस एक खामोश मुस्कान से।

नितेश वर्मा और हैप्पी होली।

Saturday, 13 February 2016

ये गुरू है

तो अब आप आ क्यूं नहीं जाते, अब तो गुरु भी 22 होने को चला है।
मैं अभी नहीं आ सकता, अभी मुल्क की ऐसी हालत नहीं की मैं घर पर आकर बैठूं।
इसी मुल्क का हवाला आप पिछले 23 सालों से दे रहे हैं, उस वक्त.. मैं ब्याह के आयी थीं और अगले महीनें ही आपकी रवानगी हो गयी थीं।
हाँ, तो क्या उसके बाद मैं आया नहीं क्या, क्या उसके बाद कोई पैसे या खानें-पीने की कमी हुयीं।
हाँ, बहोत खूब आया करते थे आप। कितने बार तो आधे रास्ते से ही आपकी पुनः रवानगी हो जाती थीं और आते भी थें तो मुश्किल-बामुश्किल 2 से 4 रोज़। वो तो शुकर हैं भगवान का.. की एक तस्वीर अभी भी हाल के उपरी तख़्त पर आपकी टिकी हुयीं हैं.. जिसे देखकर हम माँ-बेटे सुकून भर के रह जाते हैं। अब ऐसी भी क्या देश सेवा की आप अपनें घर-परिवार का परित्याग कर दे।
सिर्फ पैसों की कमी ही ज़िन्दगी को परेशान नहीं करती। कुछ और भी पहलूएं होती हैं ज़िन्दगी में.. अपनों का मोह उनसे विच्छेद भी बहोत दुखद होता हैं। मगर शायद आप इस बात को कभी नहीं समझ पाऐंगे।
ऐसा कुछ नहीं हैं, मैं भी मोह की उसी आग में हर रोज़ जलता हूँ.. मगर क्या करू.. किस फर्ज़ से मैं मुँह मोडूं। अब तो उपरवालें से बस इतनी गुज़ारिश हैं की वो मुझे इतनी वक्त और अता करें जिनमें मैं अपनों की नाराज़गी दूर कर सकूं। मैनें  मुल्की फ़र्ज़ तले और भी बहोत से फ़र्ज़ों से मुँह मोडा हैं.. उन्हें तकलीफ़ दी हैं।
अरे! आप ऐसा क्यूं बोलते है.. मैनें तो आपसे आज़ तक ऐसी कोई भी शिकायत नहीं की। बस कभी-कभी गला रूंध जाता हैं तो बरबस कोई कडी आवाज़ गले से नीचे उतर जाती हैं। फिकर तो बस मुझे गुरू की लगी रहती हैं, वो हर वक्त आपका ज़िक्र किया करता हैं। आपसे बहोत मुख़्तलिफ सा हैं वो, पता ना किस पेचेंदिगीयों में उलझा रहता है, शायद आप साथ होते तो कुछ किया जा सकता था। अभी कुछ रोज़ पहले.. बात कर रहा था कि वो आपकी तरह नहीं बनना चाहता.. वो तो अमेरिका जाकर अपनें अपनों के साथ खूब पैसा कमा के रहना चाहता हैं।
हे भगवान! तुमनें उसे समझाया नहीं कि उसके पापा भी एक बहोत अच्छें काम को करते है। उनके काम से ना केवल एक परिवार खुश होता हैं बल्कि पूरा का पूरा एक मुल्क चैनों-सुकून से साँसे लेता हैं। और कही बाहर जाकर कुछ करने से बेहतर हैं.. यही कुछ कर ले। मैं कुछ दिनों बाद उसके पास आ जाऊंगा फिर साथ में हम भी मिलकर बहोत-कुछ कर सकते हैं।
हुम्म्म! ठीक हैं, मैं कोशिश करती हूँ समझानें की। अग़र आप आ सके तो जरूर कुछ दिनों के लिये आये।
ठीक हैं, मैं कोशिश करूंगा लेकिन आना तुम ना के बराबर ही समझो।
गुरू तू कहाँ जा रहा हैं, कोई नयी ट्रिप हैं क्या तुम्हारी?
नहीं माँ, इस बार कोई ट्रिप नहीं हैं। मेरा अमेरिका का वीज़ा लग गया हैं, मैं अमेरिका जा रहा हूँ। बातें करता रहूँगा, मग़र आप मुझे रोकनें की अभी कोई कोशिश मत कीजियेगा। अब तक आप खामोश रही.. तो मेरे फ़ैसलों के दरम्यान भी ख़ामोश ही रहिये, मुझे खुशी होगी।
मग़र बेटा, मैं तुम्हारे पापा से क्या कहूँगी?
वहीं कुछ.. जो आप मुझसे मेरे पूछ्ने पर उनके लिये बताया करती हैं।
आर्शीवाद दीजिए, मैं अब शायद 3 साल के बाद आ पाऊंगा।
खुश रहो। ख़्याल रखना।
हाल ही में एक ख़बर मिली हैं की कुछ आतंकियो ने लाइन आफ कंट्रोल को क्रास करके भारतीय सीमा के अंदर घुस कर गोलाबारी शुरू कर दी हैं। लोगों की हालत बुरी हैं, इसमें कई जवान घायल तो कईयों ने देश के लिये बलिदान दे दिया हैं, फिर भी हालत मौजूदा वश में नहीं हैं। सरकार अभी चुप्पी साधे लोगों की मदद में जुटी हैं। सभी देशवासियों से अनुरोध हैं कि इस स्थिति में हौसला बनाएं रखे और एक-दूसरे की मदद करे।
रेडियों की न्यूज़ ने अब तक तो सरोज़ की हालत बुरी कर दी थीं, वो जल्दी से उठकर भगवान के पास दीप जलानें को भागी जैसे भगवान ही उसे बेसहारा होनें से बचा सकते हो। मगर कहते हैं ना जो नियति में होता हैं, उसे कोई बदल नहीं सकता। सबको अपनी तकलीफ़ खुद ही झेंलनी होती हैं, कोई किसी से ना तो किसी की खुशी को छींन सकता हैं और ना ही किसी की दर्द को उससे ले सकता हैं, जो जिसके नसीब में होता है उसे वो मिल ही जाता हैं।
सरोज़ की जलती दीप के साथ उसके हाल में रखी फोन की घंटी भी बजी। सरोज़ अब पूरी तरह हिल चुकी थीं उधर से बस यही आवाज़ सुन के सरोज़ बेहोश हो गयी थी कि- आइ एम सारी टू से, कर्नल अर्जुन सिंह इज़ नो मोर.. आइ एम रियली सारी..। हैलो.. हैलो.. मैम।
बात धीरें-धीरें बढी परिवार समाज़ इकठ्ठा हुआ। आंतकियों को पकड लिया गया था, स्थिति अब काबू में हो चुकीं थीं। सरोज़ की हालत अब पहले से कुछ सुधर चुकी थीं, उसने अपने-आप को वक्त के हिसाब से ढाल लेने में ही भलाई समझीं.. ग़म तो उसे बस इसी बात का रहा कि उसका अपना बेटा अपने पिता के मातम में आकर दो बूंद आंसू के ना बहा सका.. अपनी माँ को इस स्थिति में अकेला ही रहनें दिया। वो कभी खुद को इसकी वज़ह समझती तो कभी-कभी उसे अपनी परवरिश पर शक होने लगता, शायद उसने ही कोई कमी कर दी थीं।
माहौल से पीडित इंसान अकसर ख़ुद को किसी अंज़ाम की वज़ह मान लेता है, उसके पास शायद कहे तो और कोई विकल्प नहीं होता। अर्जुन सिंह को गुजरे आज़ 7 बरस हो चुके है, गुरू की कोई खबर नहीं हैं, जाते वक्त उसने जो नम्बर सरोज़ को थमाया था वो नम्बर तो कभी लगा ही नहीं.. ना ही गुरू की कोई खबर चलकर आयीं। अब तो उम्मीदी निराशा में बदल चुकी हैं, सरोज़ ने तो अब गुरू के आनें का इंतज़ार भी छोड दिया हैं.. मग़र कमबख़्त ये माँ की ममता हैं जो जाती ही नही.. अर्जुन सिंह जी के चले जानें के बाद अब उनका इस जहां में रह ही कौन गया एक गुरू के अलावा।
हैलो, माँ! माँ मैं गुरू.. गुरू बोल रहा हूँ।
गुरू.. गुरू कैसा हैं.. मेरा गुरू कहाँ हैं तू.. इतने दिनों से कहाँ था तू।
अए! फ़िलहाल तो मैं ऐयरपोर्ट पर हूँ, बस कुछ ही देर में आपके सामनें होऊंगा फिर आप अपने मज़ीद सारें सवाल कर लीजियेगा। ओके मैनें गाडी ले लीं हैं, अभी रखता हूँ और हाँ कुछ खानें को बना दीजियेगा मैं पूरे 1 दिन का भूखा हूँ।
और.. और बताइये यहाँ सब कैसा हैं?
हुम्म्म! सब ठीक हैं। तुम सुनाओ तुम क्या कर रहे हो अमेरिका में?
मैनें तो फ़िलहाल खुद की एक कंपनी स्टार्ट की हैं, छोटी सी हैं मग़र अपनी हैं। कुछ दिनों में भगवान ने चाहां तो सब बेहतर हो जायेगा, फिर इस बार वहाँ की माइग्रेशन की अप्लाई भी करनी हैं।
अच्छा हैं, बेहतर हैं। खुश रहो बेटा।
और बताएं – कर्नल साहब अभी भी अपनी देश-भक्ति निभा रहे हैं या अपनें कामों से फ़ारिग़ होकर आपके साथ रहनें लगे हैं।
ये कैसा सवाल हैं?
क्यूं, इसमें इतना गलत मैनें क्या पूछ लिया।
बेटा जो ज़िंदा नहीं होते हैं ना उनका मज़ाक नहीं बनाया करतें.. ना ही उन्हें ताना दिया करते हैं।
क्या? क्या मतलब है आपका! क्या हुआ पापा को।
तुम इतनी हैरानी क्या दिखा रहे हो.. क्या तुम्हें कुछ भी पता नहीं।
पहेलियां ना बुझाये, दिल भारी सा हुआ है मेरा।
तुम्हारे पापा अब इस दुनियां में नहीं रहें.. एक आतंकी हमले में वो शहीद हो गये, आज 7 बरस होनें को आये हैं ।
और आपनें मुझे बताना ठीक भी नहीं समझा, क्या मैं इतना बुरा हो गया था।
नहीं, मैनें तो नाजानें कितनी दफा तुमसे बात करनी चाहीं.. मगर जो तुमनें नम्बर मुझे दिया था वो तो कभी लगा ही नहीं।
माँ! आज़ मैं बहोत शर्मिंदा सा महसूस कर रहा हूँ। जिन यार-दोस्तों के भरोसें मैं अमेरिका गया था.. उन सभी ने मुझे धोखा दे दिया, मेरे पास तो वापस आनें तक के पैसे नहीं थें और मैं खाली हाथ वापस भी नहीं आना चाहता था। मैं खुद में इतना उलझ गया था की मुझे कभी अपनों का भी कोई होश नहीं आया और देखिये ना जब आया तो मेरे अपनें अब मेरे हाथ से छूट के चले गये।
मैनें अपनें पिता के लिये बहोत बदनेकियां पाली थीं, शायद यहीं इसकी सज़ा थीं.. कि मैं अपनें बाप के लाश को कांधे भी ना दे सका। मैं दौलत के नशे में चूर हो गया था.. मुझे अपनों की भी कोई परवाह नहीं रहीं।
बेटा! तुम्हारे पापा तुमसे बहोत प्यार करते थें.. वो चाहते थें वो यहां वापस आकर तुम्हारें साथ कोई नया बीज़नेस स्टार्ट करे.. वो चाहते थें जितनी दयारें-दिल खडी हुयीं हैं वो सब दूर हो जायें। शायद, रब को कुछ और मंज़ूर था। ख़ैर, अब देखों ना तुम कितने कामयाब हो.. वो जहाँ भी होंगे तुम्हें देखकर खुश ही होंगे। उनको कल भी तुम पर फ़ख्र था और आज़ भी हुआ होगा।
माँ, अब मैं कुछ बीते वक्त को नहीं बदल सकता मगर अब मुझे आपसे बस एक ही इल्तिज़ा हैं.. अब आप मुझसे मेरा हक ना छीनें। मुझसे आपकी ख़िदमती का हक अदा करने दे, आप मेरे साथ अमेरिका चले, वहाँ सारी चीज़ें मैनें बना रक्खी हैं। बस ना मत कहियेगा।
बेटा! अब क्या मेरा कहीं जाना। अब उम्र ही मेरी कितनी बची हैं, भगवान की रहमों-करम से तेरे पापा ने कुछ सेविंग्स कर रखें थे और तो और मेरे साथ सिया भी रहती हैं,, वो याद हैं तेरे कालेज़ की टापर।
वो अंकल प्रखर की बेटी? वो.. वो क्यूं..
अरे ऐसा नहीं बोलते बेटा, वो कितना ख्याल रखते हैं सब मेरा।
नहीं, मैं कुछ नहीं सुनूंगा.. आप मेरे साथ चलेंगी।
बेटा ज़िद मत करो, मैं नहीं चाहती की मैं उस मुल्क को छोडकर कहीं जाऊं जिसके लिये मेरे पति ने अपनी जान तक गँवा दी.. मैं उनकी मिल्कियत हूँ और मैं इन्हीं हवाओं में साँस लेते हुये चैन से गुजरना चाहती हूँ। मैं चाहती हूँ.. मैं जब तक जीऊँ उनकी यादों, उनकी खुशबुओं के साथ गुजारूं। शायद तुम्हें लगे मैं ज़ज्बाती हो गयी हूँ, मग़र अब मेरा भी दिल इस मुल्क को छोडकर जानें को कहीं नहीं करता।
हुम्म्म! तो फ़िर ठीक हैं माँ। अब मैं भी अपनी इस माँ को छोडकर कहीं नहीं जाऊंगा, आखिर अपनें बाप का बेटा हूँ.. अपनी माँ को छोडकर भला कहाँ जाऊंगा।
और तुम्हारा कारोबार?
कारोबार का कोई मसला नहीं हैं.. वो यहाँ भी शुरू किया जा सकता हैं। जितनी दूसरी मुल्क में मेहनत की हैं.. वही अगर मेहनत यहां करता तो कबका ये मकाम पा लेता और किसी भी बात का कोई गिंला ना होता।
आंटी, आपनें दवा ली। वो क्या हैं ना इतनी शापिंग करनी थीं कि मैं तो फँस ही गयी थी.. लगभग.. आंटी.. ये..
 ये.. ये गुरू है, तेरा अरसों का इंतख़्वाब।

नितेश वर्मा

Saturday, 30 January 2016

जिन्दगी धुएँ की तरह

धुएँ की लपटें लगातार उपर उठती और फिर दीवार की छत से टकरा कर पूरे कमरे में पसर जाती जैसे कोई रोशनी बिखरती हो सुबह की कुहासे में। दरअसल दिसम्बर का महीना अकसर लोगों को मौकापरस्त बना देता है ये ऐसा मौसम होता हैं जिसमें लोग खुद को वक्त का एक बोझ समझने लगते है। एक तो दिन
मुख़्तसर सी होती है और रात जब भी होने को होती है तो शाम से ही तन्हाई एक घटा बनकर छा जाती हैं। अकसर सही कहते हैं लोग - वक्त मौकापरस्तों का रहनुमा नहीं होता।
मैमसाब कुछ खाने को लाऊँ?
नहीं काका, अभी नहीं.. अभी मूड कुछ अच्छा नहीं है, थोड़ी थकान हैं.. मैं बाद में आपको खुद बुला लूंगी।
अएए! वो क्या है ना मैमसाब आज मेरा बेटा आने वाला है, तो मैं सोच रहा था आपको खिला देता तो..

अच्छा, कोई बात नहीं आप चले जाइये मैं खुद से खाना ले लूंगी।
धन्यवाद! मैमसाब।
सिगरेट की कश से जब भी सुमोना रिहा होती तो वो खुद को अपने डायरी की किसी पन्ने से जकड़ लेती। 32 वर्ष की हो चली सुमोना पेशे से एक लेक्चरर हैं और हाल में ही उनका तबादला इस क्रम में शिमला में हुआ है। शिमला में सुमोना का अपना खानदानी बंगला हैं  वो अपने तबादले के साथ अपने घर की भी देखभाल करने की कोशिश कर रही हैं।
काश! ये रिश्तों की कडवाहटें भी बंगले में पड गए इस धूल की तरह होते तो कितना अच्छा होता कमसेकम समझ आने पर उन्हें फिर से एक खूबसूरत आईने की तरह संवारा तो जा सकता, मगर ऐसा कहाँ कभी होता हैं। अपनी सोची हुई चीजें अकसर खुद को ही ना मिलने पर कष्ट देती हैं। किसी की उम्मीदें.. तो किसी को उम्मीदों से बाँधकर अकसर निराशा ही हाथ आयी हैं - सुमोना जब कभी भी ये सोचती है तो वो अंदर तक सिहर जाती जैसे पूरे शिमले की ठंड उसे बुत बना देना चाहती हो.. और अब वो ये सोचकर खामोश रहती हैं की अब शायद इनसे लड के भी क्या करना।
हैलो! हैलो..
सुमोना ने ऊंघते हुये बोला क्या काका! अभी उठा दिया आज तो सन्डे हैं ना।
सारी, मगर आज बाबा नहीं मैं आया हूँ, मेरा नाम रवि हैं, मैं आपके लिये चाय लेकर आया हूँ  और एक सवाल मैं आपको क्या कहकर बुलाऊँ मैमसाब या कुछ और।
सुमोना ने मुस्कुराते हुये कहा- बस सुमोना कहा करो, तुम क्या करते हो और हाँ, मैं चाय नहीं काफ़ी पीती हूँ लगता हैं काका ने तुम्हें बताया नहीं होगा।
हम्म। सुमोना जी बताया तो था, लेकिन मैंने अनसुना कर दिया था ये सोचकर लिटरेचर की लेक्चरर और चाय नहीं पीती होंगी।
सुमोना ने इस दफे कोई जवाब नहीं दिया और ना ही कुछ बात करने की कोशिश की - बस रवि की ओर देखकर मुस्कुरा भर दिया था।
सुमोना अपने ऐश-ट्रे को छिपाने की कोशिश से उठी की कल रात की लिखी सारी कविताएँ फर्श पर बिखर गयीं। हर बार ऐसे ही होता हैं जब भी कोई चीज़ समेटने की कोशिश करो तो कोई समेटी हुई चीज बिखर जाती हैं। मगर हालात और इंसान कभी भी अपने नाकाम कोशिशों के बाद भी बाज़ नहीं आते।
रवि ने कमरे के पर्दों को खोलकर सूरज की झनती हुई किरणों को कमरे में आने की अनुमति दे दी थी, लेकिन कमरे में इतना सन्नाटा था कि कागजों के गिरने भर से रवि चौंक सा गया। फिर कुछ सँभलकर बोला - सुमोना जी! आप रहने दीजिए मैं समेट देता हूँ इसे।
काश! काश .. कोई समेट पाता। सुमोना ये कहकर खुद से कागजों को समेटने लगीं।
रवि ने भी कोई कोशिश या कोई जिद नहीं की, वो समझ चुका था कुछ घाव जिस्म पे नहीं दिल के भीतर किसी कोने में दबे रहते हैं जो तभी खुला करते हैं जब कोई हमनवा या हमदर्द उनके साथ हो।
तुम बताओ! तुम क्या करते हो? सुना है कि बच्चों को पढ़ाने लगे हो।
जी, बिलकुल सही सुना है। थोड़ा बहुत पढ़ा लेता हूँ, इसलिये स्कूल वाले झेल रहे है मुझे।
इस बात पर दोनों ने एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा दिया।
और बताओ, कितने दिनों की छुट्टी लेकर आये हो?
छुट्टी तो लेकर नहीं आया, बस कुछ काम है उसी के सिलसिले में आया हूँ यहाँ।
अच्छा, क्या काम है?
जी, मुझे दरअसल.. एक मिनट काल आयी है जरूरी, आइ हैव टू पिक दिस।
सुमोना ने एक मुस्कुराहट अपने चेहरे पर लाकर जैसे इजाजत दे दी.. अकसर होता भी ऐसा ही है जब हमें कुछ समझ में नहीं आता तो हम किसी दूसरे की खुशी को ही अपनी खुशी मान लेते है। इंसान होते हुए भी इंसान खुद के स्वभावों से परिचित नही होता उसे अकसर खुद की ही सोचो पर परेशानी और हैरानी होती रहती है। शायद! इसलिये इंसान को कुदरत का सबसे अजीबोग़रीब पेशकश माना जाता है।
छुट्टी के दिन होने के कारण.. कोई उबाऊ जेहन को ना घेरे इसलिए सुमोना अब अपनी डायरी लिखा करती है या कोई घर का हिसाब किताब और अगर कुछ भी ना हो तो खुद को अखबारों में उलझा लेती है। लेकिन ऐसे पहले नहीं थी सुमोना.. मगर जबसे उनके पिता जी इस दुनिया से गुजरें है वो उदास रहती है और उनकी परेशानी का मुख्य कारण उनके पिता की आखिरी इच्छा है - वो चाहतें थे कि सुमोना उस लड़के से शादी करके अपना घर बसा ले जिससे बचपन में अंजाने में उसके पिता ने उसकी मंगनी कर दी थी, उस वक़्त सुमोना की उम्र ही क्या थी यही कोई 13 साल उसे तो ढंग से कुछ भी याद नहीं।
अच्छा! सुमोना जी, अब मैं चलता हूँ। आपको और कोई काम तो नहीं है।
नहीं, फिलहाल कोई काम नहीं है.. अच्छा शाम में तुम क्या कर रहे हो? फ्री हो तो चाय पीने चले कुछ बातें भी हो जाऐंगी और कुछ बाहरी तफरी भी हो जायेगा।
हम्मम, अच्छा! 7:00 बजे तक मैं आ जाऊंगा आप तैयार रहना।
ओके।
बाय, सी यू एट 7:00

कैसी लगी.. तुम्हें यहाँ की चाय?
अभी तो पहली चुस्की ही ली है.. और ये इतना गर्म चाय क्यूं पिलाते है।
क्यूं क्या हुआ? और चाय ठंडी कहाँ मिलती हैं और उसे पीता कौन है।
लेकिन कसम से, इतनी गर्म कहीं नहीं मिलती।
ख़ैर, और बताइये.. कैसा रहा आपका दिन।
मसलन?
मतलब पूरे दिन क्या किया आपने।
धूप में बैठीं रही.. कभी कभार डायरी में कुछ लिख लिया तो कभी खुद का ही लिखा हुआ कई बार पढ़ लिया।
आप खुश तो है ना?
क्यूं, तुम्हें ऐसा क्यूं लगा।
नहीं मैंने तो बस ऐसे ही.. मैंने आपको खामोशी में रहते कई बार देखा है, शायद इसलिए एकदम से ये पूछ बैठा।
चाय पीओ, ठंड हो रही है।
हुम्ममम।
दरअसल, बात बताने वाली है नहीं कि सबको चीखें मार-मार के बतायी जाये.. मगर अब किसी से ना कहो तो अंदर ही अंदर घुट के..
तो, फिर आप बताए, शायद! मैं आपकी कुछ मदद कर सकूँ।
इस वक्त तो ख़ैर कोई मेरी मदद नहीं कर सकता और ना ही मैं किसी के मदद के इंतजार में बैठीं हूँ। बात शादी से समझौते तक पहुंच गयी थी, मुझे घर संभालना था शादी के बाद.. वो भी इस शर्त पर कि मैं अपना घर खुशी-खुशी उसके नाम पर कर दूं। साँसें मैं कब लूंगी और कैसे ये सब तय किया गया था मगर मैं इसे दुत्कारती हूँ मैंने आजादी चाहीं और रिहा हो गयी।
माफ़ कीजिए इसे आजादी नहीं बेबाकी कहते है। ख़ैर आपका इंतख़्वाब भी वाजिब था, इन हालात में कोई भी वही करता जो आपने किया है। मगर यह सब समझते हुए खुद को एक दलदल के मझधार से बांध के भी तो रखा हुआ है आपने, उसका क्या?
मैं खुद कुछ नहीं समझ पा रही हूँ, मैं जाने कौन सा बोझ लेकर चल रही हूँ.. समझ नहीं आता।
मेरे ख्याल से आपको अब अपने जिन्दगी में आगे देखना चाहिए। जिन्दगी ना तो कभी एक गलत फैसले तले खत्म हो जाती है और ना ही किसी के गुजर जाने से रूकती है। अगर आप चाहें तो मैं आपके साथ आपकी तमाम जिन्दगी बिताना चाहता हूँ, मुझे नहीं पता मैं ये सब इतनी जल्दी और ऐसे जगह बैठकर क्यूं कर रहा हूँ। मेरी छुट्टियाँ तो काफ़ी लम्बी है और मुझे काम भी इन छुट्टियों में एक ही था.. अब बस, पूरी छुट्टियाँ आपके जवाब के इंतजार में गुजरेंगी, बस एक आपके हाँ के इंतजार में।

नितेश वर्मा 

2 क्लासों का फ़ासला

बस मैं उससे 2 क्लास छोटा हुआ करता था, उम्र.. उस वक्त उम्र का कोई पता नहीं हुआ करता था और ना ही कोई किसी से ऐसी बेहूदा सवाले करता था। वो दिखने में बेहद खूबसूरत थी, मगर अकसर ये अलग क्लासों का फासला एक बहुत बड़ा मसला हुआ करता है, अगर आप कभी.. ऐसी किसी.. मझदार-ए-इश्क़ के सौदागर बने हो तो आप यकीनन मेरी बातों को चुपचाप मान लेंगे। अब प्यार तो अंधा होता है साहिब, तो मैंने भी कुछ नहीं देखा.. ना उम्र, ना क्लासों का फासला, और ना ही पुराने जमाने के हालात। अब यकीन हो चला था कि मैं इसी के इश्क़ में दीवाना होने के लिये बना हूँ, इससे सफल प्यार ही मेरे जीवन का एकमात्र मकसद है। छोटी उम्र होते हुए भी एक बड़ा सा जिगर लेकर मैदान-ए-इश्क़ में कूद पड़ा, बात अब बहस की ये थी कि प्यार कैसे जाहिर किया जाए। लौंडो की गुट बांधी गयीं, अकसर इन मामलों में ऐसे ही लड़कों की जरूरत पड़ती है। ख़ैर, कुछ चाय और चिप्स पर मनाये गए तो किसी को हमउम्र साथी सहेली से प्यार हो गया था, कोई हमदर्दी में आ गया था तो कोई गॅासिप्स के बहाने तो कोई बस ये देखने के लिये कि लड़कियाँ थप्पड़ कैसे मारती है। अब जितने शक्लें उतनी जुबाँ, उतनी ही बातें, मगर इससे किसी आशिक को क्या फर्क पड़ता है।
गुट बन चुकी थी, प्यार भी दिल ही दिल में हज़ारों प्रोपोजल संवार चुका था.. अब बस उसे कैसे भी करके परोसा जाना बाक़ी था। ख़ैर ऊपरवाले की हरी झंडी मिली और प्रोपोजल जा पहुँचा और जवाब में एक करारा थप्पड़ उनके भाई ने मुझे रसीद दिया। सारी गुटबंधी एक तमाचे के शोर से गायब हो गयी। तरस खाकर फिर मुझे भी छोड़ दिया गया, बस तक़लीफ इस बात की रह गयी कि उसने ना तो इज़हार कुबूल करा और ही अपने भाई से मुझे पीटने दिया। बात ये अरसों तक दिमाग में कोई समाधान नहीं ढूंढ पायी की आखिर वो था क्या? क्या वो भी मुझसे प्यार करती है और करती है तो भाई को इज़हार वाली बात क्यूं बता दी। अकसर ऐसे मामलों में लोग समन्वय बिठाते है तो मैंने भी वहीं किया, फिर से पीछा करने का सिलसिला जारी हुआ नजरों से नज़रें मिली कितनी दफा तो कुछ पल को ठहरी भी। मगर वो कहते है ना जमाने की आँख लग गयी, कुछ दिनों बाद मामला सामने आया उसे मुहब्बत तो थी मगर किसी और से जो उससे 2 क्लास बड़ा था, मेरे मुहल्ले का मुँहबोला भाई.. उसकी सहेली का दोस्त.. जिसके जिम्मे मुझे स्कूल भेजा जाता था।

नितेश वर्मा 

उम्र: एक कहानी सी

मेरे ख्याल से छुट्टियों में सबको घर चले जाना चाहिए। शहर में कोई हो ना हो मगर वहाँ की गलिया जरूर होती हैं जो आपके इंतजार में पागल रहती हैं। उम्र बड़ी नाज़ुक सी चीज है, जिस वक्त में वो गुजरती है उसी के ख्यालों में डूबी रहती है।
बचपन बहोत शानदार थी मेरी - उम्र 11 साल। मुहल्ले का रावण, अभी दिमाग शैतानी वाला है। क्रिकेट का दिन भर खेल, नाले में गयी गेंद को निकालना फिर उसे बिना धोये कंटीन्यू क्रिकेट करना.. और इससे भी कुछ कसर बाक़ी रह जाये तो उसी हाथ से किसी दोस्त के खरीदे सामान में हिस्सा कर लेना.. जो हिस्से में आया उसे मुँह में ठूंस के फिर क्रिकेट कंटीन्यू कर देना। उस वक़्त अंग्रेजी पढ़ाने लिये एक मास्टर आया करते थे 150 ₹ महीने पर.. ये बात बहोत अच्छे से याद है क्योंकि हमेशा की कूटाई के साथ हर दफा ये बात रटवायी जाती। थोड़ी गरीबी थी, मगर सुबह के लिए 1 ₹ और शाम के लिए एक अधन्ना मिल जाया करता था, कहिये तो पूरे ठाठ में था मैं। सुबह 1 ₹ की निमकीन और शाम के अधन्ने से कंचे। कंचे बहुत कमाए हैं मैंने अपनी जिंदगी में, इस बात की बहोत खुशी है, और इसे बताने का अपना ही एक अलग मज़ा। पढ़ाई एक मंहगे से संस्कृत स्कूल में.. फीस 500₹। अभी भी वो बहुत मंहगी स्कूलों में से एक है.. ये बात भी बिलकुल अच्छे से याद है क्योंकि जब भी कूटाई होती.. ख़ैर.. छोड़िये.. जाने दीजिए।
अब उम्र 17 है - एक बहोत ही मुँहजोर लड़का। अपने कालोनी का सिकंदर.. नहीं सिकंदर नहीं.. चलो फिर हिटलर.. पूरा का पूरा अपना राज। अब घर से रोजाना बढ़ा दिया गया है.. सुबह में 10 ₹ और शाम के 7 ₹.. शाम वाला आज तक समझ में नहीं आया 7 ₹ ही क्यूं.. क्योंकि उस वक़्त 7 ₹ में एक गोल्ड-फ्लैक भी आती थी। अब कूटाई कम हो गयी है, घरवालों की परेशानी बढ़ गयी है.. निजात के मौके तलाशें जा रहे है। और मेरे अभी भी ठाठ चल रहें है।
अब उम्र 19 है - घरवाले खुश है, बस माँ को अपवाद में लें ले तो। एक नया शहर, इंजीनियरिंग कॉलेज। दाखिला हो गया है, बिना कुटाई के फी भी बता दी गयी है। लोन पेपर्स लेकर आने की हिदायत भी दे दी गयी है। अब रोजाना महीनवारी तनख़्वाह में तब्दील हो गया है। एक मल्टीमीडिया सेट, लेप्टाप और कुछ नये कपड़े.. जूते पुराने ही है पिछले दीवाली पर खरीदे गये थे। कुल मिलाकर फिर से ऐश ही ऐश हैं, एक दफा फिर दुनिया घाटे में और मैं फिर मुनाफे में। इंजीनियरिंग कालेज, दारू-सिग्रेट से दिल नहीं लगा.. एक लड़की से बेशक.. और बेशर्म प्यार हो गया। ख़तों और तस्वीर के सिलसिले से आगे निकलकर फेसबुक का सहारा लिया गया। प्यार आगे बढ़ा फिर मुझसे बेहतर एक और लड़का बीच में आ गया, अब प्रेम कहानी ख़त्म हो गयीं है।
अब उम्र 23 है - इंजीनियरिंग कंप्लीट हो चुकी है, नौकरी ना के बराबर लगी है 19500 ₹ पर। बात पहले 27000 ₹ पर तय थी, फिर नालायक समझकर 19500 ₹ पर नौकरी थमा दी गयी। मैंने इंकार करना चाहा, फिर घरवालों ने 19500 ₹ पर ही खुशी जता दी.. नौकरी कर ली मैंने। 6000 ₹ लोन के कट जाने लगे है, 5500 ₹ पी जी वाले अंकल। घर वालों के मोबाइल रिचार्ज में 1000 ₹ उसके बाद सारा का सारा माल मेरा.. फिर से पूरी ठाठ.. ऐश ही ऐश है। उधार लेकर एक बाइक भी ले ली है.. सेकैन्ड हैंड, फिर कुछ दिनों बाद उसे चोर चुराकर ले गए.. खुशी है कि नयी नहीं खरीदी थी। फिर से इस दफा मुनाफे में।
अब उम्र है 27 साल - एक सभ्य इंसान, नज़रें सीधे रखकर चलने वाला इंसान। कविताएं, ग़ज़ले करने लगा हूँ.. कुछ शार्टस-स्टोरी भी लिख लेता हूँ, जो लिखता हूँ उसी को बार-बार पढ़ता हूँ, दूसरों से चिढन होती है.. सुनता भी नहीं। छुट्टियों के इंतजार में रहता हूँ, अगली दफा जो शहर गया उसे भी अपने साथ ही उठाकर इस शहर ले आऊंगा। बार-बार आना-जाना अच्छा नहीं लगता। और कहीं ले आया तो फिर.. मैं मुनाफे में और पूरी की पूरी दुनिया घाटे में। एक और बात अब तनख़्वाह 65000 ₹ हो गयीं है, अब ये कैसे हुआ मुझे खुद भी पता नहीं।

नितेश वर्मा 

अब कल से

अब कल से सब बदल रहा है और मैं भी बदलने की पूरी कोशिश करूंगा। घरवालों ने शादी तय कर दी है, जॅाब तो मैंने तुम्हारे छोड़ देने के कुछ दिनों बाद ही कर ली थी। उन्हें लगता है मैं बहुत ही बड़ा इंजीनियर हूँ इसलिए मुझे मानो-सम्मान देकर मैनेजर बना दिया गया है। दिन भर ख़ामख़ा की शायरी और कविताएं लिखा करता हूँ.. थोड़े बहोत सिग्नेचर करने होते है बस.. वो पीने वाला तो कब का छोड़ दिया। अकसर जब भी टी वी आन करता था वो बेहूदा पता ना सुरेश या नरेश था.. आकर अपनी परेशानी सुनाकर मुझे भी परेशान कर देता। वो तो माँ ने कसम याद दिलायी थीं कि उन्होंने 7 बरस पहले मुझे नशे से दूर रहने की कसम देकर जबरदस्ती इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ने को भेजा था। तब किसे पता था, तुमसे मिलने के बाद सबसे प्यार हो जायेगा और तुम्हारे चले जाने के बाद खुद से नफ़रत। बरहाल तुम्हारे बारें में भी सुना.. तुम तो मास्टर हो गयीं हो एकदम, रोज़ अखबार में आर्टिकिल्स आते है तुम्हारे.. बस अब पढ़ने की हिम्मत नहीं रही, एक जमाने में तुमसे सुनने की आदत थी अब वो भी नहीं रही।
तुम्हारी तस्वीर को अब भी उसी नाबेल के नोट से लगाकर रक्खा है जहाँ पर एकदम से सब उलट जाता है और फिर 30 साल पीछे जाकर प्रेमी-प्रेमिका मिल जाते है। बेहद रोमांटिक शाम हो जाती है, हल्की बारिश हवाओं के साथ चलती है। अब बस उसी के ताक में हूँ कि कहीं से भी वो दिन मेरे लिए भी लौट आए। फेसबुक के "हमदर्द है तू", "जा बेवफा", "फिर मिलेंगे" जैसे कई पेज्स के कमेन्ट बाक्स में ये कहानी पोस्ट कर चुका हूँ। बहोत लाइकस मिलते है.. रिप्लाइज़ भी आते है और एक बात बताऊँ.. लड़कियाँ भी लाइकस करती है.. बस तुम्हारी तरह कोई कामेन्ट नहीं करती। फ्रेंड- रिक्वेस्ट की भरमार लगी पड़ी है, अब जाकर यकीन हुआ ये पेज्स एडमिन कितने महान होते है। तुमसे ज्यादा शिकायत नहीं होने की एक बड़ी वजहें ये पेज्स ही है.. कभी फुरसत में हो तो आना फिर देखना मेरा तमाशा.. मैं भी वहाँ हीरो हो गया हूँ।
कल बारात है, कार्ड तुम्हारे पसंद का ही छपवाया है मैंने.. देखो अपना आखिरी शर्त भी पूरा कर दिया मैंने।अब जो फिर इसी तरह कहीं मेरे पोस्ट करते-करते अगर वक़्त 30 साल पीछे पलट गया तो फिर सारी सवाले मेरी होंगी और फिर इस दफे घाटे के सौदे में तुम। अगर तुम्हारी खूबसूरती भी साथ वापस आ गयीं उस मासूम से चेहरे के साथ तो फिर सारे शिकवे माफ़।
तुम्हारे अख़बार में ही छपने को भिजवा रहा हूँ, छाप देना। पसंद आया हो तो सबसे उपर ही छपवा देना। सोचता हूँ तुम्हें शुक्रिया की जरूरत नहीं होगी, फिर भी शुक्रिया.. क्यूंकि
अब कल से सब बदल रहा है।
इस बार अलविदा जरूर लिख भेजना, मेरे बाय के जवाब में - बाय।

नितेश वर्मा 

मैं ख़ामख़ा था।

वो बेहद खूबसूरत थी और मैं बहोत मासूम। उसकी खूबसूरती उसे सबसे जोड़े रखती तो मेरी मासूमियत पे वो फिदा रहती। उसके नखड़े बहोत हुआ करते थे और उन नखड़ों का जिक्र किसी शाम के रोमांटिक नोबल का एक हिस्सा। वो जल्दी किसी से बातें नहीं करती मगर घंटों खुद को किसी के ख्यालों से बांधें रखती। पहलेपहल तो लगा जैसे वो कोई तिलिस्म हो और मैं कोई बेपरवाह राही, जो बरसों के प्यास को लिये उसके करीब तक जा पहुंचा हूँ। उसकी खूबसूरती उसकी आँखों में कैद थी जैसे, वो अगर खामोशी से भी दो पल देख लें तो जैसे समुंदर भर की प्यास गायब हो जाये। अकसर उसे मुझसे काम हुआ करता था कभी किसी वजह से तो कभी किसी वजह से। मुझे भी ये मिलने-मिलाने का दौर बहोत हसीन लगने लगा था। बात मुलाकात से आगे बढ़ी तो इश्क़ ने दस्तक दे दी, अब वो सामने ना भी होती तो भी वो मुझमें कहीं-न-कहीं घुलती रहतीं और मैं उसके कैद में एक और मासूमियत के चादर के साथ मनमौजी होकर एक हसीन से सफर पर निकल जाया करता। मुझे ज्यादा बोलना अच्छा नहीं लगता था मगर जब भी कभी वो बोलती उसे घंटों खामोशी से सुन सकता था। वो दरअसल मेरे मासूमियत पर एक लिहाफ सी थी, अगर वो साथ ना होती तो मैं भी कुछ और होता और मेरे बगैर भी वो वो ही होती।

नितेश वर्मा और वो।

एक जमाने का स्कूल

उम्र बढ़ा तो क्लास भी बदलने लगी, समझ बढ़ी तो स्कूल-कालेज। सिलसिला ऐसे ही जारी रहा जिम्मेदारीयाँ बढ़ी तो शहर बदलने लगे और जब कुछ बदलने को नहीं रहा तो मैं बदलने लगा। दरअसल बदलाव मुझसे कुछ ऐसे जुड़ा रहा की चाहकर भी मैं उससे पीछा नहीं छुड़ा पाया।
बात ग्यारहवीं क्लास से शुरु हुई थी, शुरु क्या हुई थी.. बस नजरों का हेर-फेर हो जाया करता था। कभी फुरसत से मैं उसे देख लेता था तो वो कभी जल्दबाजी में मुझे। मूसलसल लोगों में यह चर्चा का विषय बना रहा था, लेकिन जुर्रत किसी की ऐसी होती नहीं थी कि नाम उछाला जाए। भय बच्चे को बाँध के रखती है। एक वाकअया याद आ रहा है इसपर- जाड़े का मौसम था, स्कूल सुबह 9 बजे से शाम के 4 बजे तक होती थी। स्कूल पुराने ज़माने की थी, बच्चे बहुत मुश्किल से खुदको स्कूल से जोड़कर रख पाते थे। उस वक्त एक मास्टर साहब हुआ करते थे, प्रधान थे तो थोड़ी ठाठ रहतीं थी उनकी। हमलोग भी बड़े निर्लज हुआ करते थे, वो जब मूड में आए हमलोगों को कूट देते थे और हम कूटा के खिंखिया देते। ये बात हमें चुभंती नहीं थी जब तक हमें प्यार का बुखार नहीं चढ़ा था। जब सबके हिस्से में प्यार मुकर्रर-मुकम्मल हुआ तो बात शान तक आ गई। अब मैं कुछ ज्यादा ही मरखांह हो गया था, रामधारी सिंह दिनकर की कविता "कृष्ण की चेतावनी" का हर वक़्त पूरे क्लास में घूम-घूम के पाठ किया करता था। एक दिन क्लास को फिर जमघट बनाकर कृष्ण का भेष धरा गया, उसी रटी-रटाई कविता के साथ और फिर मास्टर साहब आकर पीछे से लतिया दिये, खूब जब कुटाई हो गयी तो मैंने बहसबाजी शुरु की और मुझे प्रधान के हवाले कर दिया गया। शिकायत ये की गयी कि लड़का पूरे क्लास में घूम-घूम कर अश्लीलता फैलाया जा रहा था, लड़कियों को जीना भी दूभर हो गया है, उनकी तरफ से आए दिन मुझे लेकर शिकायत आती रहती है। भरपूर कुटाई हुई और घर भेज दिया गया, दर्द को छिपाने के लिये मैंने ठंड का बहाना बनाया जो कि बहोत ही असरदार रहा। हालत सुधरी तो स्कूल पहुंचा, पूरा माहौल बदला हुआ था लड़कियाँ क्लास के एक ओर बैठने लगीं थीं और लड़के मन मसोसकर दूसरी तरफ। अब लड़कियों से बात करने की मनाही भी थी, प्यार का सीन तो बहुत ओंछी हरकत माने जाना लगा। स्कूल को लगा अब बच्चे भी सुधर गये है और वो एक प्रगतिशील समाज के बच्चों का उत्पादन करने लगे है। बच्चों को अब नम्बर्स के हिसाब से क्लास में बिठाया जाने लगा और तेज हो रहे बच्चों के साथ लडकियों को महफूजियत से उनके क्लास में बिठाया जाने लगा। स्कूल बिजनेस और उन्नत छात्रों के उत्पादन का एक अद्भुत नमूना बनकर सामने आने लगा, हर साल ऐडमीशन भेडियों की तरह होने लगी। हालत ये हो गयी थी कि बच्चे कैसे भी पढ़ें पढ़ेंगे तो इसी स्कूल में।
अब स्कूल आज बहुत आगे निकल चुका है, कल एक दोस्त ने बताया- भाई! 60000/ में ऐडमीशन दिलाकर आया हूँ, बेटी ने टेस्ट क्लीयर किया था। तेरे वाले ही स्कूल में, जिसमें तू कभी पढ़ता था।
- अच्छा! कोंगरेट्स हर। मिलता हूँ, फिर कभी तुझसे।
- अच्छा, बाय।
- बाय।
- हुम्मम! स्कूल।

नितेश वर्मा 

जलील होना पड़ता है।

जिन्दगी मूसलसल गुजरती रहती है, उसकी अपनी ही एक सिद्धमान गति है.. जो ना कभी किसी बुरे वक़्त में जल्दी गुजरती है और ना ही किसी अच्छे वक़्त में ठहरती हैं। जिन्दगी हर रोज़ कुछ ना कुछ सीखाती रहतीं है, बताती रहती है.. और हर दफ़े कोई ना कोई इम्तिहान लेती रहती है। और आदतन या नसीबयित कुछ भी कह लीजिए मैं हर दफे फेल हो जाता हूँ। जैसे फेल होना ऐसा हो गया है- जैसे साँसें लेना, पानी पीना, भोजन करना.. अगर जब तक फेल ना हो जाऊँ तब तक कुछ अच्छा फील नहीं होता।
जलील होना तो जैसे बचपन से ही जुड़ा रहा। बचपन में.. मैं दुबला-पतला हुआ करता था बिलकुल अभी की तरह.. बस उस वक्त इतनी सोच-समझ नहीं हुआ करती थी। उस वक्त बड़ी जोशों-खरोसों के साथ कुश्ती प्रतियोगिता होती थी, मेरे दादा भी मुझको प्रतियोगिता जीतते हुए देखना चाहते थे। सिलसिला जारी हुआ.. मेरी ट्रेनिंग शुरू हुई.. पहलवानों को बुलाया गया, फिर मुझे युद्ध-कौशल सिखलाया गया और प्रतियोगिता में ज़बरन जुगाड लगाकर सम्मिलित कराया.. और फिर जाकर मैं फेल हो गया। उस वक़्त दादा ने बहोत ज़लील किया, ह्रदय जैसे द्रवित हो उठा। मगर बच्चा था, क्या करता मन मसोसकर रह गया। परिवार के लोगों ने तय किया चलो पहलवानी नहीं कर पाया तो क्या, घर का वारिस है - खूब पढ़ाई करेगा और अव्वल दर्जें का आफिसर बनेगा। फिर क्या था, एक अच्छे प्रतिष्ठित स्कूल में नामांकन कराया गया.. घर पर ट्यूशन के लिये उसी स्कूल के मास्टर को पढ़ाने के लिये बुलवाया गया, कुल मिलाकर बहुत खर्चे किये गए। मास्टर साहब की ज्यादा ही खातिरदारी की गई जब तक मैंने बोर्ड का इक्ज़ाम नहीं दिया था.. बोर्ड के इक्ज़ाम से पहले तक मैं स्कूल का हीरो था फिर बोर्ड के इक्ज़ाम में आकर फेल कर गया वो क्या है ना उस वक़्त मास्टर साहब ने सेट किये हुए क्योंश्चन 10 दफे सोल्व नहीं करवाये थे। अब फिर इस दफे फिर से जलील होना पड़ा। बात धीरे-धीरे लोगों तक पहुंचती उससे पहले जैसे-तैसे कर कराकर कम्पार्ट का इक्ज़ाम दिलवाकर बाहर इंजीनियरिंग के लिए भेज दिया गया। खौफ अब सीने में बना रहने लगा.. पढ़ाई-लिखाई होने लगी.. परिवार वालों को अब यकीन बस लगभग होने ही लगा था कि लड़का सुधर गया है, कि तब तक जाकर इश्क़ ने मुझे मुस्कुराते हुए गले लगा लिया। मुहब्बत हुआ तो चर्चें भी होने लगी और बात उड़ते-उड़ते मेरे घर के छत से भी एक दिन गुजर गयीं। बड़ी लानत हुई थी खुद पर उस दिन.. एक बार और जिल्लत उठानी पड़ेगी। अगले ही दिन घर बुलाया गया, मेरी हाजिरी हुई.. लास्ट इयर और घरवालों का तकाजा, लड़की ज्यादा अहमियत रखती है तो परिवार छोड़ दो और अगर परिवार तो वो लड़की छोड़ दो। बहुत मुश्किल से गुजर रहा था, दिल को समझा-बुझा के, रो-गा के परिवार के साइड में फैसला सुना दिया। फिर इश्क़ के इम्तिहान में फैल हो गया और फिर जलील होने उस लड़की के पास चला गया। इंजीनियरिंग पास करी तब-तक उस लड़की के प्यार में पागल हो-होकर शायरीयां करने लगा, कविता-कहानी लिखने लगा। लोगों को पसंद आने लगा तो फिर रोज़ लिखने लगा। कुछ दिनों बाद घर पहुँचा कुछ हित-रिश्तेदार भी घर पहुँचें थे, नौकरीपेशा नहीं होने पर जलील होना पड़ा, फिर एक दफा और फेल। अब कुछ लोग कहने लगे कि बेटा हाथ से निकल गया है, नाम डूबा दिया है इसने। बस आपको तो अब यहीं दिन देखना रह गया था कि बाप अफ़सर और बेटा झोला लटकाए दिन-भर प्रकाशकों के पास दौड़ रहे है। एक बार फिर फेल हुआ था, लेकिन इस बार जलील कोई और हुआ था। मेरी कामयाबी, मेरी नाकामयाबी, मेरे करतूत, मेरी आदतें कैसे मेरे अपनों को भी जलील और गौरवान्वित बनाता है, उस दिन जाकर आभास हुआ था।
आदतें बदलीं तो जैसे दिन भी बदलने लगे, कोशिश की तो नौकरीपेशा भी हो गया, जिम्मेदार होता हुआ देखकर परिवार के लोगों ने शादी भी करा दी। अब फेल होने से डर लगने लगा लेकिन किसी को एक दफा भी मैंने जाहिर नहीं किया की मैं हर रोज़ फेल होता हूँ और हर रोज जलील होता हूँ अपनी नजरों में। अब लोग मेरी हर रोज़ की कामयाबी पर जश्न मनाते है तो मैं भी उनके जश्न में जीभर के झूम लेता हूँ। खुद का जीना भी क्या जीना होता हैं, मैं तो दूसरों के खुशियों के लिये जीता हूँ। मेरी आँखों में कभी झांककर देखोगे तो तुम्हें एक समुंदर मिलेगा और उन लहरों के बीच अधमरे से पड़े हुए कुछ बेहद ही खूबसूरत नावें। अब ज्यादा लिखूंगा तो फिर मतलबी हो जाऊंगा और फिर फेल.. और फिर इस दफे आपकी नजरों में जलील।

नितेश वर्मा 

हिन्दुस्तान-पाकिस्तान

बात बहुत अरसे पुरानी नहीं है, बस इतना समझ लीजिए की उस वक़्त देश अंग्रेजों का गुलाम नहीं हुआ करता था। कहीं भी कोई भीषण हाहाकारी नहीं मची थीं, बस छुट-पुट लोग कभी-कभी अपनी बातें मनवाने को जुलूस निकाल लिया करते, कोई फ़तवे जारी हो जाते मगर उग्रता देश से बाहर जा चुकी थीं। और सत्तेधारियों का ये मानना था की लोग अब उनका बहिष्कार कर रहें है, वो कुछ ज्यादा ही आज़ाद ख़्याली हो गए है। आए दिन लोगों को कमी महसूस होने लगती वो पुलिस प्रशासन से लड़ बैठते, अब कुछ लोगों को लगने लगा था कि विद्रोह भड़कने वाला है, इन्हें वक़्त रहते ना संभाला गया तो देश में फिर से कोई गड़बड़ी मच जायेगी। देश में खलबली का एक मुख्य कारण हिन्दुस्तान-पाकिस्तान का विभाजन भी माने जाने लगा था। हैदराबाद के मुसलमान इससे काफी नाराज थे, मगर सद्र-ए-सियासत का हुक्म था, सो उसे निभाया गया। कुछ मुसलमान  हिन्दुस्तान में रह गए तो कुछ पाकिस्तान चले गये। हालांकि इसमें सफ़र किसी ने तय नहीं किया, कुछ लोग तो बहुत दिनों तक यह समझ नहीं पाएँ की वो पाकिस्तान कब पहुंच गए। हालांकि जैसे-तैसे मामला जाकर हल हुआ, जब तक लोग मुतमइन हुए देश की हालत सुधर चुकी थी।
अब समस्या इससे कुछ लोगों को होने लगी की मुसलमान प्रधान देश के बाद भी क्यूं मुस्लमानों का एक आधा हिस्सा हिन्दुस्तान में ठहर गया।कुछ दिनों तक मामला सियासी निगरानी में रहा फिर उसे जनहित करार कर दिया गया। सियासतदानों के यह मान लेने के बाद कुछ ना-नुकूर करके लोगों ने भी इसे मान लिया।
कुछ चाहने वाले जो किसी ना किसी चाहत में जी रहे थे, मुल्क आज़ाद होने के बाद उनके याद में तड़प-तड़प कर मर गये। किसी को देश की मिट्टी नसीब नहीं हुई तो कोई जेहनी तौर से बीमार होकर मर गया। हिन्दुस्तान-पाकिस्तान विभाजन कुछ लोगों के लिये वरदान साबित हुआ तो कइयों को लेकर डूब गया, फिर भी लोग जनवादी रूप लेकर मौन रहे। अब सारी बातें शासन-प्रशासन तय करने लगी। लोगों को लगा जैसे अब सब ठीक होने लगा है। आज़ादी के कुछ बरसों के बाद हिन्दुस्तान-पाकिस्तान की बनीं नहीं, आए दिन ये मामला सामने आने लगा कि वो अपना हक़ चाहते है, बात कश्मीर से चलकर हैदराबाद तक पहुंच गई। बात जब और बढी तो दूसरे मुल्कों ने तक़ाजा किया, बड़े मुल्कों ने हुक्म फरमाया - दोनों देशों को एक सुचारु रूप से विभाजित किया गया, तारें बिछाई गयीं उसके उपर डाइनामाइट लगाया गया, सैनिकों को रखवाली पर बिठाया गया। सब मिला-जुलाकर लगभग इतना खर्च हुआ जितने में एक और मुल्क अपनी हालत सुधार सकता था।
जब-तक मुल्क इन मुश्किलातों से फ़ारिख़ हुआ, देश की आम जनता भाषा, जात, लोकतंत्र जैसी अनेक मुद्आए लेकर रैलियां निकालने लगीं, धरने पर लोग बैठने लगें। आए दिन देश के आम लोगों ने हिन्दुस्तान मुर्दाबाद और पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाने शुरु कर दिये। शुरुआत में दोनों मुल्कों ने सोचा ये अगली मुल्क की कोई शातिराना चाल है। सैनिकों की भर्ती की जाने लगी, जब लगा कि हाल अपने इख़्तियार में नहीं है तो ज़बरन लोगों को घर से उठाकर सैनिक बनाया जाने लगा। मुल्क अंदर ही अंदर कातिलाना हुक्म फरमाए जा रहा था और लोग उफ़्फ भी ना कर पा रहे थे। जब कुछ दिनों बाद मामला दुरूस्त हुआ तो सियासतदानों को यह पुख्ता सबूत मिल गया कि यह हाल पड़ोसी मुल्क की साज़िश के अनुरूप था। माँग करने वाले लोग अब बार्डर पर तैनात रहने लगे, जब कभी फुरसत मिलता चिट्ठियाँ लिख लिया करते। महीने में एक बार डाकिया आता और आकर हाल सुना जाता।
धीरे-धीरे जब माहौल बदलने लगा लोग अपने ज़िन्दगी में मसरूफ़ होने लगे। कइयों ने तो करोड़ों-अरबों में पैसे जमा कर लिये, धीरे-धीरे जब औक़ात बढी लोग विदेशों में जाने लगे। कुछेक को विदेश भाने लगी तो कइयों को लताड़ कर निकाल दिया गया। धीरे-धीरे सियासी निगरानी और इंतेजामात कम किया जाने लगा। फौजियों की आए दिन नृशंस हत्याएँ होने लगी, मुल्क परचम पर लहरा रहा था तो ध्यान गया नहीं। लोगों ने भी अंदेख़ा कर दिया। लोग अपने घर से परेशान रहने लगे थे, मुल्क का पता किसी को नहीं चला। कभी हिन्दुस्तान पाकिस्तान की कमियां गिनाता तो कभी पाकिस्तान हिन्दुस्तान को जीं भर कर कोसता। दोनों मुल्क के लोग इस बात से इतने चिढे हुए थे कि, जब भी कोई ऐसी रिपोर्ट आती वो फिर कोई दूसरा चैनल ट्यून कर देते। कुछ लोगों का कहना था कि कभी फिर हिन्दुस्तान और पाकिस्तान पूरा हिन्दुस्तान हो जायेगा तो कुछ कहते थे अगर पूरा पाकिस्तान हो जाये तो क्या बहस है। हर रोज़ बस इसी बात पर मार-काट चल रही थी, अगर पूरा हिन्दुस्तान पाकिस्तान हो गया तो पूरे हिन्दू कहाँ जायेंगे।

नितेश वर्मा 

हर्फ़-ए-इश्क़

बात तब की है जब हम करीबन 14 या 15 के रहे होंगे। उस समय मैं काफ़ी हद तक मासूम और युवा दिखने लगा था और वो भी मुझसे कुछ उम्र में बड़ी दिखने लगी थी। तब उनके पिताजी ने एक दिन एतराज़ जता दिया की वो मुझसे मिलने ना आया करें और ना ही किसी हमउम्र के बच्चों के साथ बाहर निकलकर खेला करें। बात तो पहले कम ही समझ में आयी थी, फिर धीरे-धीरे लगा जैसे बात सही ही है। उस वक़्त ना तो ज्यादा पढाई-लिखाई होती और ना ही बढ़ती उम्र में लड़कियों को घर से बाहर घूमने की आजादी और जो लड़कियाँ बेबाक हो जाती उन्हें या तो समाज से निकाला कर दिया जाता या फिर उनका जनाजा उठा दिया जाता। शादी से पहले या शौहर के बदले किसी और से इश्क़ करना लगभग एक गुनाह के बराबर था और कभी-कभी ये गुनाह उनके अर्थी पर जाकर खत्म होती थी। ज़ाहिल जमाना हुआ करता था, फिर भी लोग इश्क़ किया करते थे। इश्क़ करने के लिये ताक़त की नहीं हिम्मत की जरूरत होती थी। जमाना एक तरफ खून की होली खेलता तो दूसरी तरफ़ दो जिस्म बरसात के इंतजार में टकटकी लगाए काली घटाओं को देखा करतीं। ख़ैर, मुतालबा एकबेएक बंद नहीं हुआ.. कई थप्पड़ रसीदें गए, गुंडागर्दी की गई, सरेआम जिल्लत उठानी पड़ी, बात तब जाकर खत्म हुई जब जान बंदूक की एक गोली पर जाकर टिक गयीं। समझौता हुआ, माना-मनाया गया। अक्ल के पंडों को दूर-दूर से मामला हल करने को बुलाया गया। कुछ वक़्त लगे, फिर यह तय हुआ गर्म खून है, मुतालबा तो ऐसे बंद नहीं होगा.. लड़की की शादी करा दी जाए.. दूर रहेगा.. कुछ दिनों में संभल जाएगा.. और वो भी बच्चों के हो जाने के बाद अपनी जिंदगी में मसरूफ़ हो जाएगी.. प्यार भी धीरे-धीरे जाकर दोनों भूला देंगे। तो बात चलकर यह तय हुआ कि मुहब्बत में अब मुझे रिहाई देनी होगी। लोगों का कहना था मुहब्बत रिहाई भी माँगती है मगर एक आशिक़ से माँगती है ऐसी दलीलें पहली दफ़ा सुन रहा था या उसे करने की कोशिश में लगा था। उम्र समय के साथ ढलती गई वो अब 20 की होने लगी थी और मैं अब भी उसकी गली से हर सुबह-शाम गुजर जाया करता, किसे पता है जो इश्क़ में रिहाई देता है वो ताउम्र खुद तकलीफ़ में जीता रहता है और सब सोचते है आखिर उसका गया ही क्या है।

आखिर बहुत सी कोशिशों के बाद उन लोगों की भी दुआ कुबूल कर ली गयीं। उसका निकाह पढाया जा चुका है, रूख़सती भी अगले इतवार को तय किया गया है। मुहब्बत हार गयी हालात और परिवार के आगे, एक बार फिर मुहब्बत ने एक हाथ को छोड़कर दूसरा हाथ थाम लिया। हांलाकि ये मुझे पता है की वो मुझे छोड़कर गयीं है.. मगर मेरी मुहब्बत उसकी आँखों में आज भी उतनी ही जवाँ है जितनी 6 बरस पहले हुआ करता थीं.. और शायद अगले सालों दर साल ये ऐसा ही रहेगा। हमने मुतालबा बंद किया है मुहब्बत करना नहीं, एक दूसरे के सीने में हम धड़कते रहेंगे चाहे हमारी जिस्म किसी को भी सौंप दी जाए। यही आखिरी कसम थी हमारी जो हमने साथ में एक-दूसरे के हाथों को थाम के किये थे। अब इन बातों को गुजरें लगभग 23 साल हो गए है, आज वो मिली भी थी, मगर शायद पहचान नहीं पायी, आँखों पर अब चश्मा लग गया है.. दिखता नहीं.. या मुझे देखना नहीं चाहती। या किसी की कहीं बात आज सच साबित हो रही हो, समय की दूरी ने मुहब्बत को भी मिटा दिया, समझ नहीं आता मगर वो कहते हैं ना, सच जल्दी समझ भी नहीं आता। ख़ैर बाक़ी सब ठीक है, अभी जिंदा भी हूँ और धड़कने भी बखूबी धड़क रही है। शायद कुछ है जो बाक़ी रह गया हम दोनों के दरम्यान, शायद।

नितेश वर्मा

शिकायतें

ना ही फेसबुक पर ज्यादा फ्रेंड़स हैं और ना ही इस मुख्तसर सी जिन्दगी में। गर्ल-फ्रेंड बनाने की हालांकि बहोत सी कोशिशें की मगर अब तक नाकाम ही रहा हूँ। फुरसत के वक़्त जब भी चलकर करीब आते है एक बोरियत और उबाऊ जेहन को घेर लेती है, किसी नामालूम से पते पर जैसे घंटों कोई चलती ट्रेन आकर ठहर जाती है.. बिलकुल वैसी वाली ही फिलिंग मंडराती रहतीं है.. कोई काली सी घटा बनकर जो ना तो बरसती ही है और ना ही छटती है।
तो जब भी फुरसत में होता हूँ कोई किताब लेकर बैठ जाता हूँ। कभी साहिर, कभी गुलज़ार तो कभी दिनकर, कभी निराला। ज्यादा पढता नहीं ज्यादा सीखने की कोशिश करता हूँ, मगर अकसर नाकाम होता हूं।
ऐसा बहोत बार हुआ है जब मैंने देखा है मिर्ज़ा गालिब, मीर तक़ी मीर, फ़राज़, फ़ैज, राहत इंदौरी, जावेद अख्तर और भी बहोत सारे नामचीन शायरों के शे'र को अपने नाम से लोगों को प्रकाशित करते हुए। मैं इसपर अपनी कोई टिप्पणी नहीं रखता हूँ कि उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए या फिर वो ऐसा करके बहोत गलत कर रहे हैं। लेकिन अगर वो उनकी शे'र को उनके नाम से पोस्ट करे तो ज्यादा बेहतर होगा। लिखने-सीखने का सिलसिला जारी रहेगा और साहित्यिक मान भी बढेगा।
अग़र आप बुरा लिखते है तो इसमें कोई बुरा नहीं, कोई भी इंसान मुकम्मल नहीं होता। सब में कोई ना कोई, कुछ ना कुछ कमी रहती ही है। मगर आप खुद को बेहतर दिखाने के लिए किसी दूसरे का कलाम अपने नाम से प्रकाशित करते है तो यह चोरी के लांछन वाले हिस्से में चला जाता है। मैं तो यह कहता हूँ, हर कलाम की प्रशंसा होनी चाहिये लेकिन कोई भी कलाम चोरी की नहीं।
उर्दू अदब के थोड़े से जानकार, जो उर्दू जुबान ना तो लिख सकते है और ना ही ढंग से बोल सकते है। शहरयार बनकर अकसर घूमा फिरते है। अब ऐसा है जैसे वो ग़ालिब की तख्ते-ए-दार पर बैठे है और वो जो कुछ भी पाद देंगे वो हवा में गालिब-ए-दीवान बनकर लिख जायेगी। ये वहीं लोग है जिन्हें अकसर दूसरों से प्रतिस्पर्धा रही है, अपनी नाकामयाबी वो दूसरे को ओछे बताकर छिपा लेते है। ये चोर बिलकुल नहीं होते, लेकिन ये पैर में फंसे उस रस्सी की तरह होते है जो तो चलने की आजादी तो देता है मगर एक दायरे में, जो दायरा उन्हें उचित लगता है। बदलते वक्त का स्वरूप उन्हें ना बदले मगर जमाना किसी 100/50 के रूक जाने से नहीं रूकने वाला। अगर आप पीछे मुड़कर देखने लगे तो यह संभव नहीं की ये जमाना भी पीछे मुड़कर देखने लगें। जब तक वक़्त था साहिर, शैलेंद्र, मजरूह इत्यादि लिखा करते थे लेकिन आज गुलज़ार, ज़ावेद, इरशाद लिखते है। आज के वक़्त के हिसाब से वहीं लिखा जा रहा है जो आज बोला जा रहा है। अगर आप शुद्ध हिन्दी भाषी या उर्दू के जानकार है तो आज के ऐसे लिखने वाले भी कई हैं। बस जरूरत यह है की आप अपने आलीशान बंगले से निकलकर दो-चार किताबें खरीद लाये उन किताबों की भीड़ में इनकी भी कोई किताब पड़ी होगी धूल खाते हुए, उन्हें आहिस्ते उठाइए वो इतनी तल्ख हो चुकी है कि अब कोई बोझ सहन नहीं कर सकती, फिर उस पर पड़ी धूल को साफ करके पढिए, आपको आपका साहिर, शैलेंद्र, मजरूह, शहरयार, प्रदीप और भी नजाने कौन-कौन मिल जाएगा। हाल आज ऐसा की कविता कवि को नहीं पाल सकती एक कवि को अपनी कविताएं पालनी है, और पेट पालने के आगे सब मजबूर होते है साहिब।
अगर आज शायद लिखा जायें "जब तूने गेंसू बिखराए बादल आए झूम-झूम के" तो यह उतना ना सुना जाये जितना "आज रात का सीन बना लें"। कसक किसी बात की नहीं है वक़्त बदले है.. तो हालात भी, साथ-साथ ख्वाहिशों भी.. सोच भी। अगर फिर भी किसी को मुश्किल है तो वो जरूर आए मुम्बई,बालीवुड.. यहाँ सबको मौका मिला है, आप बेहतरीन है आपको और भी जल्दी मिल जाएगा। आए और अपनी प्रतिभा को सारे जमाने को दिखायें, सब से उन्हें पसंद करवाये। डायरेक्टर, प्रोड्यूसर, म्यूज़िक डायरेक्टर, एक्टर और भी नाजाने किस-किस को समझायें
की आपने जो लिखा है वो बहोत बेहतरीन है, यह गाना आते ही शहर में आग की तरह फैल जाएगा। और अगर यह भी नहीं कर पाए तो फिर तकिया-कलाम उठाइये, एक-आध घंटे इन गीतकारों को गरियाइये फिर कंबल तान के सो जाइये, देर से उठियेगा तो बॅास भी गरियाऐगा आपको, बोनस के साथ।
बात बस इतनी है कि जो समय की मांग है, बस उसे ही पूरा किया जा रहा है। और कुछ गाने जो शायद म्यूजिक स्लो कर दे तो आपको आपके जमाने में लेके चला जाए -
# कितने दफ़े दिल ने कहा, दिल की सुनी कितने दफे।
# अगर तुम साथ हो।
# कतरा-कतरा मैं गिरूं
# मैं तुझे बतलाता नहीं, पर अंधेरे से ड़रता हूँ मैं माँ।
# दीवानी मस्तानी हो गई।
# जी ले जरा।
# अभी मुझमें बाक़ी थोड़ी सी है ज़िंदगी।
# जब तक है जान।
# हमारी अधूरी कहानी।

नितेश वर्मा 

31 दिसम्बर 2015

इस साल से उतनी ही मुहब्बत है जितनी इस साल के जल्दी-जल्दी बीत जाने से शिकायत। कुछ ख्याल अभी जेहन से उतरकर लबों पर ठहरें ही थे कि यह सितगमर अलविदा कहकर जाने को उतारूँ हो गया। ख़ैर ख्याली पुलाव है, पकती रहेगी और पक कर खैराती भी बटेगी। जो अपना हो नहीं पाया, जो खुद में ठहर नहीं पाया, जो हर वक़्त नज़रों में चुभता रहा, जो मुझे समझ नहीं पाया, जो मुझे समझ नहीं आया, सब एक जलती टीस बनकर मुझमें बरकरार रहेगी, जाने कब तलक! पता नहीं। 2015 खुशनुमा भी रही तो कहीं बदनुमा भी रही। सफ़र बेहतरीन रहा कुछ से दुश्मनी हुई तो बहोतों से दोस्ती, किसी की यादों में रात गुजारी तो किसी की आँखों में किताब बनकर ठहर गये, जानलेवा सरप्राईज भी मिलीं, कहीं दौड़ते-भागते साँसें भी ठहर गयी। सब कुछ हुआ फिर भी बाकी बहुत कुछ रह गया इस उम्मीद में 2016 भी जीना है किसी उम्मीद में।
अब जो कसक उठी है तो तुमपर ही आकर ठहरेगी एक बार फिर से कोशिश होगी तुम्हें खुद में चुरा लेने की आखिर ये 31 दिसम्बर की रात कुछ हसीन हो तो यह दिल जाकर 2015 से मुतमईन हो। बस इंतजार है तुम्हारा, और रहेगा जाने कब तलक, पता नहीं। 2015 के बीत जाने से, 2016 के आने से यकीनन बदलेगा ये जिस्म मगर रूह वहीं रहेगी तुमसे एक हो जाने की जिद में। मिलन की आस में हाय! ये दिसम्बर भी गुजर गयीं प्यास में।

ये 31 दिसम्बर की रात आज फिर गुजर जायेगी
कहते है कि 2016 आके खुशियों से भर जायेगी।

नितेश वर्मा और 2016